बिखरे हैं स्वर्ग चारों तरफ : समीक्षा दिगंबर नासवा

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“बिखरे हैं स्वर्ग चारों तरफ” डॉ उर्मिला सिंह, (ब्लॉग: “मन के-मनके”) के अपने शब्दों में “यह पुस्तक एक खोज है, उस स्वर्ग की जो हमारी मुट्ठी में बंद है” वो आगे लिखती हैं “मैंने अपने स्वर्ग को स्वयं ढूँढा है, स्वयं रचा है और उसे पाया है”.
और सच कहूं तो जब मैंने इस पुस्तक को पढ़ने की शुरुआत की तो मुझे भी लगा की वाकई स्वर्ग तो हमारे आस पास ही बिखरा हुवा है छोटी छोटी खुशियों में, पर हम उसे ढूंढते रहते हैं, खोजते रहते हैं मृग की तरह.
अपनी शुरूआती कविता में उर्मिला जी कहती हैं की स्वर्ग खोजने बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है ये तो आस पास ही फैला है, देखिये ...   
सूनी गोद में
किलकारियां भरते हुए
अनाथ बचपन को
आँचल से ढंकते हुए
बिखरे हैं, स्वर्ग
चारों.....तरफ

आगे आगे उनका कवी मन सचेत भी करता है, यहां तक की अपने आप से भी प्रश्न खड़ा करता है और कहता है
अपने निज अस्तित्व की खोज में
अपनत्व के खंडहरों पर चलते रहे
बहुत देर हो जाएगी और ....
खंडहरों के भी रेगिस्तान हो जाएंगे
ढहता हुवे टीला, रेत का
दबी फुसफुसाहटों में
कहता रह जाएगा..
बिखरे...हैं स्वर्ग
चारों...तरफ

मुझे याद आता है जब पहली बार हमारे मोहल्ले में ब्लैक एंड वाईट टी.वी. आया तो तो हम भी इतने खुश थे जैसे वो हमारे घर में आया हो. हफ्ते में एक दिन आने वाला चित्रहार और कृषि दर्शन भी ऐसे देखते की बस इससे ज्यादा कोई खुशी ही नहीं जीवन में. और आज जबकि सब कुछ है सब के पास फिर भी इतनी खुशी नहीं ... शायद इस लिए ही उर्मिला जी ने कहा है की खुशी ढूंढनी है तो बाहर निकलो अपने आप से और महसूस करो ...
पुस्तक की अधिकाँश कविताएं इन्ही बिखरे हुवे स्वर्ग की तलाश है ... हर कविता आपको जागृत करती हुयी सी है की ये देखो स्वर्ग यहां है ... यहां है ... और यहां भी है ... यहां उन सब कविताओं को लिख के आपका मज़ा खराब नहीं करना चाहता ...
आपको एक किस्सा सुनाता हूँ जानकार आश्चर्य होगा किताब पढ़ने के बाद ... मैंने बिल्डिंग के कुछ बच्चों से पूछा की मुझे अपने बचपन की कुछ यादें बताओ जिनसे तुम्हे खुशी मिली हो और जो तुम्हें याद हो तो उनके पास कुछ जन्म दिन की यादें, कुछ अपने स्कूल की बातें, और बहुत जोर डालने पे जहां जहां घूमने गए उन जगहों की बाते ही याद थीं ... फिर जब उन्होंने मुझसे पूछा तो लगा मेरे पास तो जैसे हजारों यादें हैं बचपन की ... छोटी छोटी बातें जिनमें जीवन का स्वर्ग सच में था ... छत पे बिस्तर लगा कर सोना, तारों और बादलों में शक्लें बनाना, गिल्ली डंडा और लट्टू खेलना, छुट्टियों में मामा या बूआ के घर जाना, आम चूपना, गन्ने चूसना, मधुमक्खी के छत्ते तोड़ना, बिजली जाने पे ऊधम मचाना, होली की टोलियाँ बनाना ... और देखा ... बच्चे बोर हो के चले गए अपने अपने फेस बुक पे ...   
असल बात तो ये है की स्वर्ग की पहचान भी नहीं हो पाती कभी कभी और इसलिए उर्मिला जी कहती हैं ...
स्वर्ग पाने से पहले
पहचान उसकी है जरूरी
स्वर्ग के भेष में, छुपे हैं
चारों तरफ कितने बहरूपिए

अगर गौर से देखें तो स्वर्ग तो पहले भी हमारे पास था और आज भी हमारे पास ही है बस हमें ढूँढना होगा छोटी छोटी खुशियों में.
इस पुस्तक के माध्यम से उर्मिला जी सचेत करना चाहती हैं की जागो, देखो आस पास की वो सभी चीजें जिनमें स्वर्ग की आभा सिमिट आई है, वो दिखाना चाहती हैं की कौन से पल हैं जीवन में जिनमें स्वर्ग पाया जा सकता है पर जाने अनजाने उन लम्हों कों देख नहीं पाते.
मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूँ की मुझे उर्मिला जी की ये किताब पढ़ने का मौका मिला, अपने बच्चों कों भी आग्रह कर के पढ़ने को कहा है जिससे वो भी जान सकें की “बिखरे हैं स्वर्ग चारों तरफ”
पुस्तक का प्रकाशन “शिवना प्रकाशन पी सी लैब, सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर – ४६६००१ (म.प्र)” से हुवा है मूल्य १२५ रूपये.

आप इसे उर्मिला जी से भी प्राप्त कर सकते हैं. उनका ई मेल है ...
ईमेल: urmila.singh1947@gmail.com
Mobile: +91-8958311465

श्री दिगंबार नासवा के ब्‍लाग स्‍वप्‍न मेरे http://swapnmere.blogspot.in/2012/06/blog-post_27.html से साभार ।

आसान अरूज़, ग़ज़ल के छंद विधान तथा तकनीकी जानकारी पर डॉ आज़म की लिखी एक मुकम्‍मल पुस्‍तक

बहुत दिनों से प्रकाशन इस प्रयास में था कि हिंदी में ग़ज़ल कह रहे ग़ज़लकारों के लिये देवनागरी में ही एक ऐसी पुस्‍तक हो जिसमें ग़ज़ल से संबंधित सम्‍पूर्ण तकनीकी जानकारी उपलब्‍ध हो । उर्दू में तो इस प्रकार की कई पुस्‍तकें हैं लेकिन हिंदी में कोई सम्‍पूर्ण पुस्‍तक नहीं है । इस काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया हिंदी और उर्दू के साथ साथ ग़ज़ल पर समान अधिकार रखने वाले शायर डॉ आज़म ने । पुस्‍तक पर वे पिछले दो सालों से काम कर रहे थे । और होते होते ये पुस्‍तक अब एक मोटे ग्रंथ की शक्‍ल ले चुकी है । आसान अरूज़ के नाम से प्रकाशित ये पुस्‍तक हिंदी में ग़ज़ल कहने वालों के लिये एक मुकम्‍मल ग्रंथ है । जिसमें लगभग सारे  प्रश्‍नों के उत्‍तर मिल जाएंगे और वो भी आसान तरीके से । पुस्‍तक का प्रारंभ में सीमित संस्‍करण छापा जा रहा है । पुस्‍तक को मिलने वाले प्रतिसाद के बाद और प्रकाशित किया जायेगा ।

पुस्‍तक की जानकारी

नाम - आसान अरूज़ ( ग़ज़ल का छंद विधान तथा तकनीकी जानकारी )

लेखक - डॉ. आज़म ( सुकून, आई-193, पंचवटी कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल, 426030, दूरभाष 09827531331)

मूल्‍य - 300 रुपये

पृष्‍ठ संख्‍या – 196 हार्ड बाउंड

ISBN -978-93-81520-02-4

प्रकाशक - शिवना प्रकाशन, पीसी लैब, सम्राट कॉम्‍प्‍लैक्‍स बेसमेंट, बस स्‍टैंड के सामने, सीहोर, म.प्र. 466001 दूरभाष 07562405545

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कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा को शिवना प्रकाशन ने किया सम्‍मानित

DSC_6863 ये षडयंत्र रचा जा रहा है कि अंग्रेजी अमीरों की भाषा हो जाये और हिंदी गरीबों की भाषा हो जाये । यदि ऐसा हो जाता है तो ये देश के लिये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा । हिंदी केवल गरीबों की का सूचक होकर रह जायेगी । सन दो हजार पचास तक आकर हिंदी की स्थिति भारत में बहुत खराब हो जायेगी । उक्त विचार लंदन के सुप्रसिद्ध भारतीय मूल के हिंदी कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा ने शिवना प्रकाशन द्वारा आयोजित अपने सम्मान कार्यक्रम में बोलते हुए व्यक्त किये ।

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तेजेन्द्र शर्मा इन दिनों भारत के प्रवास पर आये हुए हैं । तथा शिवना प्रकाशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने के लिये वे सीहोर आये । कार्यक्रम की अध्यक्षता स्थानीय स्नात्कोत्तर महाविद्यालय में हिंदी की विभागाध्यक्ष डॉ पुष्पा दुबे ने की । शिवना प्रकाशन की ओर से साहित्यकार पंकज सुबीर ने तेजेन्द्र शर्मा के व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर विस्तार से चर्चा की । इस अवसर पर शिवना प्रकाशन की ओर से तेजेन्द्र शर्मा का सम्मान किया गया ।

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डॉ पुष्पा दुबे, डॉ राजकुमारी शर्मा ने शाल श्रीफल भेंट कर उन्हें सम्मानित किया । इस अवसर पर पुश्किन सम्मान से सम्मानित वरिष्ठ कथाकार हरि भटनागर को भी सम्मानित किया गया ।

DSC_6883 इस अवसर पर बोलते हुए डॉ पुष्पा दुबे ने तेजेन्द्र शर्मा के साहित्य पर विस्तार से प्रकाश डाला । उन्होंने कहा कि तेजेन्द्र शर्मा जी की कहानियों में विचारों तथा संवेदनाओं को अनोखा संतुलन दिखाई देता है ।

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उनकी कहानियों में विदेशी परिवेश होने के बाद भी कहीं न कहीं भारत दिखाई देता है । तेजेन्द्र शर्मा की कहानी कब्र का मुनाफा एक ऐसी कहानी है जो ये बताती है कि दुनिया के हर हिस्से में समस्याएं एक सी हैं ।

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इस अवसर बोलते हुए तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि हिंदी की समस्या हिन्दुस्तान में ही है विदेशों में नहीं है, वहाँ पर तो हमारा दीवानापन हिंदी को जिंदा रखे हुए है ।

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भारत में ये दीवानापन कहीं न कहीं कम हो रहा है जिसके कारण आज हिंदी की ये हालत है । उन्होंने कहा कि हम हिंदी के भले की बात मंचों पर तो करते हैं लेकिन हिंदी को जिंदा रखने के लिये कोई भी तैयार नहीं है ।

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हम अपने बच्चों को पढ़ाते अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों में ही हैं । साहित्य की बात करते हुए उन्होंने कहा कि केवल कुछ ही विषयों पर लिखने का दबाव डालकर हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा अहित किया जा रहा है । विचारों को थोपा जा रहा है ।

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हिंदी लेखकों की लगभग ढाई पीढ़ी हिंदी के दो पुरोधाओं को ही संतुष्ट करने में खत्म हो गई । केवल उनके अनुसार साहित्य रचने के चक्कर में हिंदी साहित्य का बहुत अहित हो गया है । श्री शर्मा ने कहा कि लेखक कभी प्रवासी नहीं होता वो केवल लेखक होता है ।

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दुनिया की किसी भी भाषा में ये नहीं होता कि उसके कहानीकार को प्रवासी कहा जाये, ये केवल हिंदी में ही होता है । इससे पूर्व अतिथियों का स्वागत वरिष्ठ पत्रकार दिनकर कद्रे तथा शैलेष तिवारी ने किया । इस अवसर बड़ी संख्या में शहर के गणमान्य नागरिक एवं पत्रकारण उपस्थित थे ।

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पत्रकारों से मुखातिब हुए तेजेन्द्र शर्मा
सीहोर । पत्रकारों से चर्चा करते हुए लंदन से आये वरिष्ठ साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि हिंदी को समाज में जिंदा रखने के लिये सभी वर्ग के लोगों को प्रयास करने होंगे । क्योंकि यदि हम अभी जागरूक नहीं हुए तो आने वाले वर्षों में हम अपनी इस मातृभाषा से काफी दूर हो चुके होंगे । एक प्रश्न के उत्तर में श्री शर्मा ने कहा कि मैं अंग्रेजी के विरोध में नहीं हूँ ना ही हिंदी भाषियों को अंग्रेजी से दूर करने की बात कर रहा हूँ ।

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मैं तो हिंदी का सेवक हूँ और मैं ये चाहता हूँ कि जहाँ भी भारतीय रहें वे हिंदी को न छोड़ें अपने बच्चों को अंग्रेजी भाषी स्कूलों में पढ़ाएं जरूर पर अंग्रेजी एक विषय के रूप में पढ़ी जाये और उस पर भी विद्यार्थियों की पकड़ हिंदी की भांति रहे किसी दूसरी भाषा पर पकड़ बनाने के लिये ये जरूरी नहीं है कि हम अपनी मातृभाषा को ही भूल जाएं । आज विदेशों तथा इंटरनेट पर हिंदी को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है पर दुर्भाग्य का विषय ये है कि अपने देश से ही हिंदी को बाहर धकेलने की कोशिश की जा रही है । अंत में उन्होंने सभी लोगों से आग्रह किया कि वे अपने स्तर पर हिंदी के सम्मान को  बचाने की दिशा में प्रयासरत रहें मेरा विश्वास है कि सभी के प्रयास कभी विफल नहीं होते ।

पुण्य स्मरण संध्या में शशिकांत यादव और डॉ आजम सम्मानित हुए

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सुकवि जनार्दन शर्मा, गीतकार रमेश हठीला, शायर डॉ. कैलाश गुरू स्वामी तथा गीतकार मोहन राय की स्मृति में आयोजित पुण्य स्मरण संध्या में सुप्रसिद्ध कवि श्री शशिकांत यादव शशि को सुकवि रमेश हठीला सम्मान तथा डॉ. मोहम्मद आज़म को जनार्दन शर्मा सम्मान से सम्मानित किया गया। दोनों सम्मानित कवियों ने अपने काव्य पाठ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया ।
स्थानीय ब्ल्यू बर्ड स्कूल के सभागार में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में नगरपालिका अध्यक्ष श्री नरेश मेवाड़ा उपस्थित थे कार्यक्रम की अध्यक्षता शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिंदी की विभागाध्यक्ष डॉ पुष्पा दुबे ने की । कार्यक्रम के आरंभ में अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित किया चारों साहित्यकारों के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की । सुकवि संतोष जैन संतु ने मां सरस्वती की वंदना का सस्वर पाठ किया । आयोजक संस्था स्मृति के संयोजक पत्रकार बसंत दासवानी, समाजसेवी ओमदीप, श्री राममूर्ती शर्मा, रियाज मोहम्मद, अनिल पालीवाल, अनवारे इस्लाम, हरिओम शर्मा दाऊ, अब्दुल रशीद शैदा, रमेश गोहिया,  श्रवण मावई ने पुष्पगुच्छ भेंट कर अतिथियों का स्वागत किया । स्वागत भाषण देते हुए बसंत दासवानी ने आयोजन के बारे में जानकारी दी । इस अवसर पर देश के प्रसिद्ध कवि श्री शशिकांत यादव को प्रथम सुकवि रमेश हठीला सम्मान तथा शायर डॉ. मोहम्मद आज़म को तैंतीसवां सुकवि जनार्दन सम्मान प्रदान किया गया । श्री नरेश मेवाड़ा तथा डॉ. पुष्पा दुबे ने शाल, श्रीफल तथा सम्मान पत्र भेंट कर ये सम्मान प्रदान किये । इस अवसर पर बोलते हुए नपाध्यक्ष श्री नरेश मेवाड़ा ने कहा कि 19 जनवरी का ये दिन सीहोर के साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों तथा श्रोताओं को याद दिलाने की आवश्यकता ही नहीं होती, तैंतीस सालों में इस आयोजन ने एक अलग पहचान स्थापित कर ली है । उन्होंने कार्यक्रम को और भव्य स्तर पर आयोजित किये जाने की बात कही । डॉ पुष्पा दुबे ने अपने अध्यक्षीय भाषण में चारों साहित्यकारों के साहित्यिक अवदान पर विस्तृत चर्चा की । उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन के दूसरे उदाहरण बहुत मुश्किल से मिलेंगे जहां पर शहर इस प्रकार से अपने साहित्यकारों को याद कर रहा है । उन्होंने इस बात को लेकर स्मृति संस्था की सराहना की कि तैंतीस सालों से एक आयोजन को अनवरत किया जा रहा है । कवि शशिकांत यादव ने काव्य पाठ से पहले अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सीहोर मुझे अपना ही शहर लगता है यहां कविता के संस्कार हैं । श्री यादव ने अपनी सुप्रसिद्ध कविता फैसला तो हो चुका है फासले घटाइये  सहित कई छंद और मुक्तक पढ़े । श्रोताओं के अनुरोध पर उन्होंने गुजरात सरकार के लिये लिखी अपनी कविता मतदान ज़रूरी है भी पढ़ी । डॉ. मोहम्मद आज़म ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कवि के रूप में, शायर के रूप में मुझे सीहोर शहर ने ही तराशा है, सीहोर ने ही मुझे स्थापित किया है । डॉ आज़म ने अपनी प्रसिद्ध ग़ज़ल नहीं जहर की थैली इन्सां के मुंह में, ज़बां से मगर वो उगलता बहुत है, सहित कई ग़ज़लों का पाठ किया जिन्हें श्रोताओं ने खूब सराहा । कार्यक्रम का संचालन कर रहे स्मृति के अध्यक्ष तथा साहित्यकार पंकज सुबीर ने श्रोताओं के अनुरोध पर अपने गीत दर्द बेचता हूं मैं का सस्वर पाठ किया । अंत में आभार व्यक्त करते हुए हरिओम शर्मा दाऊ ने कहा कि सीहोर के लोगों ने उस शायर को गलत साबित कर दिया है जिसने कहा था कल कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे । कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहर के बुद्धिजीवी, कवि, पत्रकार, साहित्यकार तथा श्रोता उपस्थित थे ।

शिवना प्रकाशन से पुस्‍तकें प्रकाशन करवाने की प्रक्रिया

शिवना प्रकाशन से पुस्‍तकें प्रकाशन करवाने के लिये कई रचनाकारों द्वारा लगातार संपर्क किया जा रहा है उस हेतु ये जानकारी दी जा रही है ।
शिवना द्वारा उच्‍च गुणवत्‍ता के आधार पर पुस्‍तकों का प्रकाशन किया जाता है । प्रकाशन की प्रक्रिया में पुस्‍तक की कम्‍पोजि़ग, डिज़ायनिंग, आवरण आदि शामिल होता है । साथ ही पुस्‍तक के प्रकाशन के पश्‍चात उसके विमोचन, प्रचार आदि पर भी प्रकाशन द्वारा कार्य किया जाता है । प्रकाशन द्वारा लगभग 100 से भी अधिक समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, इंटरनेट पत्रिकाओं में पुस्‍तक की समीक्षा प्रकाशित करवाई जाती है । पुस्‍तक की समीक्षा विशेषज्ञों द्वारा लिखवाई जाती है । जिसे प्रकाशन के लिये भेजा जाता है । देश भर की सभी प्रमुख पत्र, पत्रिकाओं में शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्‍तकों की समीक्षा प्रमुखता के साथ प्रकाशित की जाती है । साथ ही विभिन्‍न पुरस्‍कारों के लिये भी प्रकाशन द्वारा अपने स्‍तर पर पुस्‍तकें भेजी जाती हैं । पुस्‍तक का प्रकाशन उच्‍च गुणवत्‍ता के काग़ज़ पर किया जाता है । प्रकाशन के दौरान प्रूफ की बारीकी से जांच की जाती है तथा शुद्धता का पूरा ध्‍यान रखा जाता है । आवरण का डिजायन विशेषज्ञों द्वारा तैयार किया जाता है । शिवना प्रकाशन को अपना ISBN नंबर मिला हुआ है । सभी पुस्‍तकों पर प्रकाशन का नंबर प्रकाशित किया जाता है । पुस्‍तक की गुणवत्‍ता का पूरा ध्‍यान रखा जाता है जिसके कारण भारत ही नहीं भारत के बाहर के भी लेखकों ने शिवना प्रकाशन से अपनी पुस्‍तक का प्रकाशन करवाया है । 
प्रकाशन द्वारा सीधे पुस्‍तक प्रकाशन की प्रक्रिया -
सर्वप्रथम लेखक को अपनी पुस्‍तक की पांडुलिपि प्रकाशन के लिये भेजनी होती है । यूनिकोड फांट में कम्‍पोज़ की हुई पांडुलिपि ईमेल द्वारा साफ्ट कॉपी के रूप में shivna.prakashan@gmail.com पर भेजनी होती है । जिसे प्रकाशन के विशेषज्ञों का दल देखता है तथा गुणवत्‍ता के आधार पर प्रकाशन हेतु स्‍वीकृति प्रदान करता है । प्रकाशन के पश्‍चात लेखक को 3 प्रतियां प्रकाशन की ओर से दी जाती हैं। इससे अधिक पुस्‍तकें यदि लेखक को चाहिये तो उसे खरीदनी होती हैं। यह  खरीद प्रिंट मूल्‍य पर ही करनी होती है उसमें कोई डिस्‍काउंट की व्‍यवस्‍था नहीं है ।   
सहकारिता के आधार पर पुस्‍तक प्रकाशन की प्रक्रिया -
इसके अलावा  शिवना प्रकाशन से सहकारिता के आधार पर भी पुस्‍तकों का प्रकाशन किया जाता है ।  सहकारिता के आधार पर प्रकाशित होने वाली पुस्‍तकों में लेखक को एक निश्चित संख्‍या में पुस्‍तकें खरीदनी होती हैं ।

कादम्बिनी सितम्‍बर 2011 में रजनी नैयर मल्‍होत्रा की पुस्‍तक स्‍वप्‍न मरते नहीं पर डॉ. कुमार विश्‍वास की समीक्षा ।

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कुछ विचार संगीता स्‍वरूप गीत जी की पुस्‍तक उजला आसमां के बारे में ।

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कविता प्रेमियों के लिए एक रत्नकोश  : शिखा वार्ष्णेय

संगीता स्वरुप की कवितायेँ कल्पना ,भावनाओं ,व्यावहारिकता और यथार्थ का अनूठा संगम हैं .जहाँ "पीले फूल ,"छुअन" सरीखी कवितायेँ खूबसूरत भावनाओं की परकाष्ठा  को छूती हैं वहीँ" सुर्खी एक दिन की "और "वृद्ध आश्रम" जैसी कवितायेँ यथार्थ के कठोर धरातल से परिचय कराती हैं.

जहाँ एक ओर "सच बताना गांधारी" ,और" कृष्ण आओ तुम एक बार" व्यावहारिकता पर चतुराई से संतुलित बहस करती प्रतीत होती हैं वहीं "स्वयं सिद्धा बन जाओ" और "है चेतावनी" समाज की कुरीतियों को तीखी चेतावनी देती हैं.

सधे हुए खूबसूरत शब्दों में पिरोई हुई ये कव्यशाला निसंदेह कविता प्रेमियों के लिए एक रत्नकोश है, जो हिंदी कविताओं को आम नागरिक के ह्रदय की तह तक पहुंचाता है.

शिखा वार्ष्णेय

मास्टर ऑफ जर्नलिज्म. मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी

स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक लन्दन

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हिंदी काव्‍य संसार को ये कविताएं समृद्ध करेंगी : मनोज कुमार  

कहा जाता है कि कुछ लोगों में, खासकर महिलाओं में छठी इंद्रिय भी होती है। छहों इंद्रियों को निरूपित करती, जन जीवन से रूबरू होती इस काव्‍य संग्रह में संगीता स्वरूप जी की छह दर्जन कविताएं अपनी सहज संप्रेषणीयता और ग्राह्यता से पाठकों की भावनाओं का दर्पण बन गई है। हम इसमें अपने जीवन के रूप स्‍पष्‍ट देख पाते हैं।

इन कविताओं से मानवीय संबंधों की गरिमा और मानवमूल्‍यों की परम्‍परा को जहां एक ओर जीवित रखा गया है वहीं दूसरी ओर जो कुछ सत्‍व, सार्थकता और तीखी धार है वह जीवन की जमीन से उठी इसी परंपरा की देन है।

इनके व्‍यक्तित्‍व में जहां तीखी धार सा पैनापन है वहीं दूसरी तरफ रूई के फाहे जैसी नर्मी। इन दोनों को जोड़ती सरकडे सा लचीला मन है इनका! इसीलिए परम सहजता से वह अपना सारा संतुलन बनाए रखती है, जो न सिर्फ उनके जीवन में दिखती है बल्कि रचनाओं में भी इनकी सहज अभिव्‍यक्ति मन को भाती है। जिंदगी में जो भी अनुभव किया वह इनकी रचनाओं में प्रकट होता है। कोई मुखौटा लगाकर ये अपनी बात नहीं रखती। समाज के प्रति दायित्‍वबोध रचनाओं में स्‍पष्‍ट है। यह भी स्‍पष्‍ट है कि नैतिकता और ईमानदारी इनके हथियार हैं।

इस संग्रह की कविताओं में कहीं समकालीन विसंगतियों पर उन्‍होंने दो-टूक राय रखी है, तो कहीं उनमें एकांत और संवेदशील मन का संवाद है, और कहीं लोगों के दुख-दर्द पर मलहम लगाते स्‍वर। अनुभव और कल्‍पना का ऐसा मिश्रण तैयार किया है जो हमारे मन-आंगन को भिगो जाता है। वहीं दूसरी ओर जीवन के कटु यथार्थ को अभिव्‍यक्‍त करने के लिए शब्‍दों की नई योजना भी गढ़ी है इन्‍होंने। इन कविताओं में जीवन के प्रगाढ़ रंगो की अभिव्‍यंजना है। अपने आसपास के गहन तिमिर को मोमबती की तरह आलोकित करते हैं कविताओं के शब्‍द।

इस संकलन की कविताएं पिछले एक वर्ष में अंतरजाल पर प्रकाशित होती रही है। मैं इनके सृजन का साक्षी भी रहा हूँ और पाठक भी! अंतरजाल पर प्रकाशित हो कर काव्य-रसिकों के दरवाजों पर दस्‍तक दे चुकी ये कविताएं इनकी काव्‍य-कला साधना की परिपक्‍वता का इशारा कर चुकी है। इस काव्‍य संग्रह का प्रकाशन मैं एक सुखद घटना मानता हूँ। हिंदी काव्‍य संसार को ये कविताएं समृद्ध करेंगी ऐसा मेरा विश्‍वास है और काव्‍य-प्रेमियों के बीच अपनी स्‍पष्‍ट पहचान बनाएंगी।

मनोज कुमार

निदेशक (रक्षा मंत्रालय के आयुध निर्माण बोर्ड, कोलकाता)

समीर की इसी अद्भुत शैली के पाठक कायल हैं -राकेश खंडेलवाल

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कहानियाँ जिंदगी के हर मोड़ पर बिखरी हुईं हैं। तलाश रहती है उन्हें किसी पारखी नार की जो उन्हें चुन सके और करीने से शब्दों का जामा पहना कर उन्हें सजा सके। जिंदगी के सफर में चलते हुए हर राही के पाँवों को चूमने के लिए बेकरार ये कहानियाँ उसके आगे पीछे दाएँ बाएँ और ऊपर नीचे हर ओर हैं और अधिकाँश मुसांफिर इनसे अनजाने अपनी धुन में अनदेखी मंजि़ल की ओर दौड़ते रहते हैं।
जिंदगी के कारवाँ में कुछ राही ऐसे भी होते हैं जिनकी हर बात अलग होती है। उनका अपना नारिया और हर चीज को हर जाविये से देखने की खुसूसियत रहती है। समीर एक ऐसे ही मुसांफिर हैं जो जिंदगी के हर कदम से उठा उठा कर कहानियाँ चुनते हैं और बड़ी खूबसूरती से उन्हें सबके सामने पेश करते हैं।  कहानियों का ताना बाना बुनने में जो महारत समीर को हासिल है उसे शब्दों में बयान करना असम्भव है। सीधे साधे शब्दों में वे पाठक को अपने साथ सफर पर ले चलते हैं और बड़ी सहजता से गंभीर मसलों और मुद्दों पर अपनी बारीकी का अंदाज़ पाठक को इस तरह बताते हैं की सिवाय वाह और आह कहने के उसके पास कोई चारा नहीं रहता।
प्रस्तुत कथानक को पढ़ते पढ़ते यकायक महसूस नहीं होता और फिर यकायक महसूस भी होता है की आज के समाज के मुद्दे, बाल मादूरी, समलैंगिकता, पारिवारिक वातावरण, सामंजस्य, विचलित मनोवृत्तियाँ और ओढ़ी हुई कृत्रिमाताएँ किस कदर सामने आती हैं और उन्हें किस तरह प्रस्तुत लिया जाता है की वे कहीं तो जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन जाती हैं और कहीं समाज के माथे पर लगे एक काले दांग की तरह नार आती हैं।
समीर की इस अद्भुत शैली के सभी पाठक कायल रहे हैं। समीर के इस कथानक से भी उन्हें अपेक्षाकृत अधिक संतोष मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास है। मैंने जब इसे पढ़ना शुरू किया तो एक ही बैठक में पूरा पढ़ने के लिए मजबूर हो गया क्योंकि कहानी इस कदर बहा कर आपको अपने साथ ले चलती है की इसे बीच में छोड़ना संभव ही नहीं है। समीर से आगे भी और विस्तृत कथाओं की अपेक्षा है।  शुभकामनाओं सहित।
                       -राकेश खंडेलवाल

धूप से रूठी चांदनी - एक परिपक्व कवि-मन की संवेदना देवी नागरानी

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कविता एक तजुर्बा है, एक ख़्वाब है, एक भाव है | जब दिल के अंतर्मन में मनोभावों का तहलका मचता है, मन डांवाडोल होता है या ख़ुशी की लहरें अपने बांध को उलांघ जाती है तो कविता बन जाती है | कविता अन्दर से बाहर की ओर बहने वाला निर्झर झरना है | कविता शब्दों में अपना आकार पाती है, सोच के तिनके बुनकर, बुनावट और कसावट में अपने आप को प्रकट करती है | रचनात्मक सृष्टि के लिए शब्द बहुत जरुरी है, जिनको करीने से सजाकर, सवांरकर एक भव्य भवन का निर्माण किया जाता है | दूसरी विशेषता जो कविता को मुखरित करती है वह है शब्दों को जीवंत बनाने की कलात्मक अभिव्यक्ति जो एक रीति का प्रयोग करने पर रचनाकार को कसौटी पर खरा उतारती है | इन्हीं सभी गुणों की नींव पर निर्माण करती, अपनी देश-परदेश की भूली-बिसरी यादों को जीवंत करती, जानी मानी प्रवासी रचनाकार सुधा ओम ढींगरा की सुन्दर और भावनात्मक कविताएँ " धूप से रूठी चांदनी " काव्य संग्रह में हमारे रूबरू हुई है | आज की व्यवसायिक परिस्थितियों में आदमी अपनी उलझनों के दायरे से निकलने के प्रयासों में और गहरे धंसता चला जा रहा है | ऐसे दौर में मनोबल में सकारात्मक संचार कराती उनकी कविता "मैं दीप बाँटती हूँ" अपने सर्वोत्तम दायित्व से हमें मालामाल करती है--- "मैं दीप बाँटती हूँ / इनमें तेल है मुहब्बत का/ बाती है प्यार की/ और लौ है प्रेम की / रौशनी करती है जो हर अंधियारे ह्रदय और मस्तिक्ष को | निराला जी के शब्दों में "भावनाएं शब्द-रचना द्वारा अपना विशिष्ट अर्थ तथा चित्र द्वारा परिस्पुष्ट होती है | अर्थ शब्दों के द्वारा और शब्द वर्णों द्वारा" देखिये इसी कविता की एक कड़ी कैसे भाषा के माध्यम से भावो के रत्नों का प्रकाश भरती जा रही है | उनकी दावे दारी के तेवर देखिये: "मैं दीप लेती भी हूँ/ पुराने टूटे-पुटे नफरत, ईर्ष्या, द्वेष की दीप जिनमें तेल है/ कलह-कलेश का/बाती है बैर-विरोध की लौ करती है जिनकी जग- अँधियारा सुधाजी, एक बहु आयामी रचनाकार के रूप में हिंदी जगत को अपनी रचनात्मक ऊर्जा से परिचित कराती आ रही है | उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का विस्तार उनकी कहानियाँ, इंटरव्यू, अनुवादित उपन्यास हर क्षेत्र में अपनी पहचान पा चुका है और अब ८० कविताओं का यह संग्रह अपने बहु विध वैशिष्टिय से हमारा ध्यान बरबस आकृष्ट कर रहा है | इनकी रचनाएँ आपाधापी वाले संघर्षों से गुज़रते बीहड़ संसार के बीच एक आत्मीयता का बोध कराती हैं | "आज खड़ी हूँ..../ईश्वर और स्वयं की पहचान की ऊहापोह में......" इनकी कवितात्मक ऊर्जा में आवेग है, एक परिपक्व कवि मन की गहन संवेदना, चिंतात्मक और सामाजिक बोध का जीवंत बोध शब्दों के बीच से झांकता हुआ कह रहा है : "अब दाग लगे दामन पर जितने, सह लुंगी दुनिया जो कहे झेलूंगी/ तू जो कहे ....चुप रहूंगी अपनी लाश को काँधे पर उठाये/ वीरानों में दो काँधे और ढूँढूँगी / जो उसे मरघट तक पहुंचा दे......." दर्द ही वो है जो मानव-मन की पीड़ा का मंथन करता है और फिर मंथन का फल तो सभी को समय के दायरे में रहकर चखना पड़ता है | कौन है जो बच पाया है? कौन है जो ज़ायके से वंचित रहा है? सुधाजी ने बड़ी संवेदना से समाज में पनपते अमानवीय कोण की प्रबलता को दर्शाया है | जहाँ नारी की पहचान घर की चौखट तक ही रह गई है, अपने जिम्मेदारियों की सांकल से बंधी हुई वह नारी जकड़ी हुई अपने तन की कैद में, घर की कैद में.. " दुनिया ने जिसे सिर्फ औरत / और तूने महज़ बच्चों की माँ समझा / " जिन्दगी की सारी चुनौतीयों से रूबरू कराती सुधाजी की कलम अपनी सशक्तता का परिचय दे रही है | जो कवि अपने शीश-महल में बैठकर काव्य सृजन करते है वे तानाशाहों के अत्याचारों से वाकिफ़ तो है, लेकिन मनुष्य की पीड़ा और वेदना उन्हें द्रवित नहीं करती | धरती पर न जाने कितने लोग कराहते हैं, कितना लहू बहता रहता है, कितनी साँसों में घुटन भर दी जाती है, ज़ुल्मतों का दहकता हुआ साया जब कवि मन पर अपनी छाप छोड़ जाता है, तो कलम से निकले शब्द जीवंत हो जाते हैं, खामोशियों से सम्वाद करते हैं, उन पीड़ाओं का, जिनको तनमन से भोगा ,सहा. जहाँ वेदना कराह उठती है वहीँ उनकी बानगी में हर एहसास धीमे से थपथपाता है, टटोलता है और उलझे हुए प्रश्नों का जवाब तलब करता है: "आतंकवादी हमला हो/ या जातिवाद की लड़ाई / रूह, वापिस देश अपने भाग जाती है." और फिर कटाक्ष करती शब्दावली का रूप देखिये : "तोड़ा था पुजारी ने /मंदिर के भरम को जब सिक्के लिए हाथ में बेईमान मिल गए" जीवन सिर्फ जीने और भोगने का नाम नहीं, समझने और समझाने का विषय भी है | इसी काव्य सुधा में उनके उर्वर मस्तिष्क की अभिनव उपज है उनकी अनूठी रचना (जिसको सुनने का मौका मुझे उनके रूबरू ले गया )जिससे उनकी सम्पूर्ण कविताओं की स्तरीयता एवं विलक्ष्णता का अनुभव सहज ही लगाया जा सकता है."प्रतिविम्ब "में उठाये प्रसंग समाजिक, पारिवारिक ---- चिंतन को पारदर्शी बिम्ब बनकर सामने आये.. "मैं आप का ही प्रतिबिम्ब हूँ. बलात्कार से पीड़ित कोई बाला हो/ या सवर्णों से पिटा कोई दलित ... मेरा खून उसी तरह खौलता है/ जैसे आप भड़कते थे |" लेखन कला अपनी पूर्णता तब ही प्रकट कर पाती है जब भाषा या शैली अपने तेवरों के प्रयोग से कल्पना और यथार्थ का अंतर मिटा दे... अपने परिवेश में जो देखा गया, महसूस किया गया और भोगा गया, उसे विषय-वस्तु बनाकर सुधाजी अपनी रचनाओं द्वारा पाठक को अनुभव सागर से जोड़ लेती हैं | उनकी अनेक रचनाएँ आप बीती से जग बीती तक का सफ़र करती हुई, हद की सरहदों तक को पार करने की कोशिश में कहती है अपनी कविता "शहीद" में "नेताओ और धर्म के लिए, इन्सान नहीं सिर्फ सिपाही शहीद हुआ | " हर रचना अपने धर्म क्षेत्र के दायरे में घूमती है, कहीं छटपटाती है, और कहीं- कहीं मंजिल के पास आते- आते दम तोड़ देती है | ऐसी सशक्त कविताएँ है "बेरुखी, समाज, मुड़ कर देखा, परदेस की धूप, खुश हूँ मैं ,और देस -परदेस की व्यथा- गाथा को बहुत सुन्दरता से माँ के नाम चिट्ठी में लिख भेजा सन्देश उनकी जुबानी सुनें : "परदेस से चिट्ठी आई, माँ की आँख भर आई लिखा था खुश हूँ मैं चिंता न करना घर के लिया है किश्तों पर/ कार ले ली है किश्तों पर फर्नीचर ले लिया किश्तों पर / यहाँ तो सब कुछ ख़रीदा जाता है किश्तों पर" सोच की हर सलवट पीड़ा से भीगी हुई, आँख फिर भी नम नहीं | ऐसी अभिभूत करती हुई रचनाओ के लिए सुधाजी को बधाई एवं शुभ कामनाएँ | शिवना प्रकाशन की कई कृतियों में से यह एक अनूठी कृति अब भारत और विदेश के बीच की पुख्ता कड़ी बनी है श्रेय है शिवना प्रकाशन को, हर प्रयास को जो हर कदम आगे और आगे सफलता की ओर बढ़ रहा है ! काव्य संग्रह :धूप से रूठी चांदनी, कवित्री :डॉ सुधा ओम ढींगरा पन्ने :११२ मूल्य :३०० रु प्रकाशक :शिवना प्रकाशन, P.C.Lab, Samart Complex Basement, Bus Stand, Sehore-466001. U.P.

http://srijangatha.com/Pustkayan1_6Dec2k10

साधना की एक उपज "एक टहलती हुई खुशबू" जिसमें उपासक आत्मा के अधर से कह रहा है प्यार दे दुलार दे, माँ तू सद्विचार दे - देवी नागरानी

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साधना की एक उपज "एक टहलती हुई खुशबू" जिसमें उपासक आत्मा के अधर से कह रहा है
प्यार दे दुलार दे, माँ तू सद्विचार दे
कोमल भावनाओं की कलियों को चुनचुन कर शब्दों की तार में पिरोने वाली मालिन- कवियित्री मोनिका हठीला से " एक खुशबू टहलती हुई" के मध्यम से मेरा पहला परिचय हुआ. ऐसा बहुत कम होता है कि पहली बार कुछ पढ़ो और वह अनुभूति दिल को छूती हुई गहरे उतर जाये. पर सच मानिये सीहौर के काव्य के संस्कारों ने जो खुशबू बिखेरी है वह टहलती हुई जिस दिशा में जाती है, वहीँ की होकर रह जाती है. हवाओं में, सांसों में, सशक्त शब्दावली की सौंधी- सौंधी महक रम सी जाती है.

यूं ही आवारा भटकते ये हवाओं के हुजूम

फ़िज़ूल हैं जो अगर झूम के बरसात हो

पढ़ते ही अक्स उभर आते है काले-काले बादलों के, रिमझिम-रिमझिम रक्स करती हुई बारिश के और धरती की मिटटी के महक के.

कहा किसने इन कोरे कागज़ों से कुछ नहीं मिलता

कभी शब्दों में घुल-मिल जाती है मल्हार की खुशबू..स्वरचित

ऐसी ही महक मोनिका हठीला जी की कल-कल बहती काव्य सरिता से आ रही है. उनकी रचनात्मक गुलिस्तान के शब्द सुमन अनुपम सुन्दरता से हर श्रृंगार रस से ओत -प्रोत आँखों से उतर कर, रूह में बस जाने को आतुर है. मदमाती उनकी बानगी हमसे गुफ़्तार करती है-

कलियों के मधुबन से

गीतों के चाँद चुने

सिन्दूरी क्षितिजों से

सपने के तार बुने

कविता तो आत्मा की झंकार है. कवि की रचना सह्रदय को अपनी रचना लगने लगे तो रचना की यही सबसे बड़ी सफ़लता है और यही उसकी सम्प्रेश्नीयता. लेखन कला ऐसा मधुबन है जिसमें हम शब्द बीज बोते है, परिश्रम का खाध जुगाड़ करते हैं, और सोच से सींचते है, तब कहीं जाकर इनमें इन्द्रधनुषी शब्द-सुमन निखरते हैं और महकते हैं.

काव्य के इस सौंदर्य -बोध को परखने के लिए भावुक पारखी ह्रदय की आवश्यकता है और यह टकसाल मोनिका जी को वरसे में मिली है. उनके अपने शब्दों में " सीहौर में कविता संस्कार के रूप में मिलती है और मुझे तो रक्त के संस्कार के रूप में मिली है अपने पिताश्री रमेश हठीला जी से और गुरु श्री नारायण कासट जी से " और इस विरासत को बड़ी संजीदगी से वे आशीर्वाद स्वरुप संजोकर रखती आ रहीं हैं. तभी तो उनकी आत्मा के अधर कह उठते हैं-

गीतों में बसते प्राण, मुझे गाने दो

कविता मेरा ईमान, मुझे गाने दो.

कवि बिहारी आम मुकुल जी का एक दोहा जो मुझे हमेशा लुभाता रहा है, इस सन्दर्भ में बड़ा ही उपयुक्त है; रस और महक का वर्णन करता काव्य कलश से छलकता हुआ मन को भीने-भीने अहसास से घेर लेता है -

छकि, रसान सौरभ सने, मधुर माधवी गंध

ठौर-ठौर झूमत झपट, भौंर -भौंर मधु-अंध

मोनिका जी की काव्य उपज में विचार और भाषा का एक संतुलित मेल-मेलाप आकर्षित करता है. शब्दों की सरलतम अभिव्यक्ति मन को सरोबार करती है: सादगी, सरलता, का एक नमूना पेश है--

यादों की बद्री - कर/ मेरे घर मेहमान हुई

जैसे यादों की वादी में कोई बे-आसमाँ घर हो, जिसमें हवाएं अपनी तमाम खुशबू के साथ भीतर आकर बसी हों, बिना किसी ख़बर के, बिना किसी सन्देश के.....

ख़त लिखते कोई पैग़ाम भिजवाते

ऐसे मौसम में कम से कम बात तो कर लेते

जाने ये कैसा अपनापन है जो मोनिका जी की रचनायें किसी को अजनबी रहने ही नहीं देती ! खामोशियों में भी गुफ़्तार बरक़रार रखतीं हैं सहज सहज शब्दों में--

मैंने अपना मुक़द्दर स्वयं पढ़ लिया

मेरी तक़दीर है मेरे गीत और ग़ज़ल

ये रूप झर रहा है मधुयामिनी में छनकर

इस रूप में नहाकर इक दिन ज़िन्दगी लिखूंगी ग़ज़ल

रचनात्मक भव्य भवन की नींव "एक खुसबू टहलती हुई" उनकी कुशलता का परिचय है, जिसमें मोनिका जी भावनात्मक शब्दावली की ईंटें करीने से वे सजाकर , अपने ही निर्माण की शिल्पकार बन गयी है. ऐसे काव्य के सुंदर सुमन इस गुलिस्तान में खिलते रहें, साथ साथ तन्मय करती कल कल बहती सुधी पाटकों को भाव विभोर करती रहे इसी अभिनन्दन एवं शुभकामनाओं के साथ ..

देवी नागरानी, ९-दी कॉर्नर व्यू सोसाइटी, १५/३३ रोड, बंदर, मुंबई ५०. फ़ोन ९८६७८५५७५१/

dnangrani@gmail.com

काव्य-संग्रह : एल खुशबू टहलती हुई, लेखिका: मोनिका हठीला, पन्ने; १०४, मूल्य: रु.२५०. प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, प़ी. सी-.लैब,सम्राट काम्प्लेक्स, सीहौर ४६६००१.