अग्रणी साहित्यिक प्रकाशन संस्था शिवना प्रकाशन द्वारा स्व. मोहन राय की स्मृति में दिया जाने वाला सुकवि स्व. मोहन राय स्मृति पुरस्कार सीहोर के सुप्रसिध्द शायर तथा कवि डॉ. आज़म को दिया जायेगा । यह पुरस्कार शिवना प्रकाशन तथा मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आगामी आठ मई को होने वाले अखिल भारतीय मुशायरे में प्रदान किया जायेगा ।
सुकवि स्व. मोहन राय स्मृति पुरस्कार समिति के समन्वयक पुरुषोत्तम कुइया ने जानकारी देते हुए बताया कि पुरस्कार हेतु शिवना प्रकाशन ने तीन सदस्यीय समिति का गठन शिक्षाविद डॉ. पुष्पा दुबे की अध्यक्षता में किया था जिसमें साहित्यकार द्वय रमेश हठीला तथा पंकज सुबीर सम्मिलित थे । उक्त समिति की विशेष बैठक सोमवार शाम डॉ. पुष्पा दुबे के निवास पर संपन्न हुई । बैठक में कई नामों पर विचार करने के बाद समिति ने सर्वसम्मति से हिंदी तथा उर्दू दोनों भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाले युवा कवि तथा शायर डॉ. आज़म को सुकवि स्व. मोहन राय स्मृति पुरस्कार देने का निर्णय लिया । दिनाँक आठ मई को रात्रि आठ बजे स्थानीय कुइया श्री गार्डन पर आयोजित होने वाले अखिल भारतीय मुशायरे में डॉ. आज़म को ये पुरस्कार प्रदान किया जायेगा । कार्यक्रम दो चरणों में संपन्न होगा, प्रथम खंड में शिवना प्रकाशन का पुस्तक विमोचन तथा पुरस्कार समारोह एवं दूसरे खंड में अखिल भारतीय मुशायरा होगा । प्रथम खंड में मुख्य अतिथि के रूप में विधायक श्री रमेश सक्सेना उपस्थित रहेंगें जबकि विशिष्ट अतिथियों के रूप में मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष तथा सुविख्यात शायर पद्मश्री डा. बशीर बद्र, पद्मश्री श्री बेकल उत्साही, डॉ. राहत इन्दौरी, तथा मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की सचिव श्रीमती नुसरत मेहदी उपस्थित रहेंगीं । श्री कुइया ने जानकारी देते हुए बताया कि डॉ. आज़म वर्तमान समय में हिंदी तथा उर्दू दोनों भाषाओं में लिखी जाने वाली ग़ज़लों में एक चर्चित हस्ताक्षर हैं । वे दिल्ली के पुस्तक मेले सहित देश भर के मंचों पर काव्य पाठ कर चुके हैं तथा कई स्थानों पर सम्मानित हो चुके हैं । उनकी ग़ज़लें देश भर की साहित्यिक पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं । दिल्ली से प्रकाशित होने वाली हिंदी ग़ज़लों पर केन्द्रित महत्वपूर्ण पुस्तक ग़ज़ल दुष्यंत के बाद में उनकी ग़ज़लों को लगातार दो वर्षों से सम्मिलित किया जा रहा है । श्री कुइया ने बताया कि पुरस्कार के अंतर्गत शाल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह तथा सम्मान पत्र प्रदान किया जायेगा ।
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सुकवि स्व. मोहन राय स्मृति पुरस्कार डॉ. आज़म को प्रदान किया जायेगा
सुकवि मोहन राय की स्मृति में शिवना प्रकाशन मप्र उर्दू अकादमी के सहयोग से आयोजित करेगा अखिल भारतीय मुशायरा (पद्मश्री डा. बशीर बद्र, पद्मश्री बेकल उत्साही, डा. राहत इन्दौरी शिरकत करेंगें ) ।
सीहोर के सुप्रसिध्द कवि स्व. मोहन राय की स्मृति में जिले की अग्रणी साहित्यिक प्रकाशन संस्था शिवना प्रकाशन तथा मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में एक अखिल भारतीय मुशायरे का आयोजन आगामी आठ मई को किया जा रहा है । इस आयोजन में देश भर के दिग्गज शायरों के आने की स्वीकृति मिल चुकी है ।
कार्यक्रम संयोजक राजकुमार गुप्ता ने जानकारी देते हुए बताया कि सुकवि मोहन राय की स्मृति में 8 मई शनिवार को होने वाले इस भव्य अखिल भारतीय मुशायरे में मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष तथा सुविख्यात शायर पद्मश्री डा. बशीर बद्र, पद्मश्री श्री बेकल उत्साही (बलरामपुर), डॉ. राहत इन्दौरी (इन्दौर), मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की सचिव श्रीमती नुसरत मेहदी ( भोपाल), शकील जमाली (नई दिल्ली), खुरशीद हैदर (मुजंफ्फर नगर), अख्तर ग्वालियरी (उज्जैन), शाकिर रजा (इन्दौर), सिकन्दर हयात गड़बड़ (रुड़की), अतहर (लटेरी), सुलेमान मजाज (कुरवाई), जिया राना (उज्जैन), राना जेबा (ग्वालियर), फारुक अन्जुम (भोपाल), काजी मलिक नवेद (भोपाल), आदि की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है ।
श्री गुप्ता ने जानकारी देते हुए बताया कि शिवना प्रकाशन द्वारा इस कार्यक्रम में नई प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन भी किया जायेगा । इन पुस्तकों में हिंदी की शीर्ष कहानीकार डॉ. सुधा ओम ढींगरा की पुस्तक धूप से रूठी चाँदनी, मोनिका हठीला की पुस्तक एक खुश्बू टहलती रही, गुड़गांव की कवयित्री सीमा गुप्ता की पुस्तक विरह के रंग तथा पोखरन राजस्थान के ग़ज़लकार मेजर संजय चतुर्वेदी की पुस्तक चाँद पर चाँदनी नहीं होती का विमोचन किया जायेगा । इस अवसर पर शिवना प्रकाशन द्वारा स्व. मोहन राय की स्मृति में दिया जाने वाला सुकवि मोहन राय स्मृति पुरस्कार भी जिले के चयनित साहित्यकार को प्रदान किया जायेगा । पुरस्कार के लिये डॉ. पुष्पा दुबे की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति बनाई गई है जिसमें वरिष्ठ साहित्यकार सुकवि रमेश हठीला तथा कहानीकार पंकज सुबीर को शामिल किया गया है । समिति शीघ्र ही अपनी बैठक कर पुरस्कार के नामों पर विचार करेगी । श्री गुप्ता ने बताया कि सुकवि मोहन राय सीहोर जिले के मूर्ध्दन्य कवि थे उनकी दो पुस्तकें गुलमोहर के तले तथा झील का पानी शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गईं थी । शिवना द्वारा उनकी स्मृति में हर वर्ष आयोजन किया जाता है । शिवना प्रकाशन तथा मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के संयुक्त आयोजन को लेकर व्यापक स्तर पर तैयारियाँ प्रारंभ कर दी गई हैं तथा शीघ्र ही इस अखिल भारतीय मुशायरे को लेकर आयोजन समिति की घोषणा कर दी जायेगी ।
आज शिवना प्रकाशन के वरिष्ठ संरक्षक आदरणीय दादा भाई महावीर शर्मा जी का जन्मदिन है उनको प्रकाशन की पूरी टीम की तरफ से शुभकामनाएं ।
आदरणीय दादा भाई महावीर शर्मा जी का आज जन्मदिवस है । दादा भाई से जब से जुड़ा हूं तबसे ही लगता है कि उनसे तो बरसों पुरानी पहचान है । शिवना प्रकाशन को वे अपना ही मान कर चलते हैं । उनके ब्लाग पर शिवना की सारी जानकारियां उन्होंने सहेज कर लगाई हुई हैं । उनका प्रेम और नेह हर किसी को सहज रूप से प्राप्त होता है । उनका जन्मदिन शिवना के लिये खास मौका है ।
दादा भाई के चित्र दीपक चौरसिया मशाल के ब्लाग से साभार
कई बार सोचता हूं कि यदि दादा भाई जैसे घने और छायादार वृक्षों की छांव हमें न मिली होती तो कितना नीरस होता हम सब का जीवन । एक बात जो मुझे उनमें सबसे अधिक पसंद आती है वो है उनकी लगन । वे इस उम्र में भी साहित्य के प्रति इतने समर्पित हैं कि कभी कभी तो रश्क होने लगता है उनसे । रश्क इस बात से कि वे इस उम्र में भी सक्रियता के साथ काम कर रहे हैं और एक हम हैं कि ज़रा काम कर लें तो दस दिन तक बहाने बनाते हैं कि नहीं अब कुछ दिन का अवकाश चाहिये ।
दादा भाई का स्वास्थ्य पिछले दिनों ठीक नहीं रहा डाक्टरों ने उनको आराम की सलाह दी लेकिन वे फिर भी काम में लगे रहते हैं ।
जन्मदिन की मंगल कामनाएं
और दादाभाई का लिखा ये गीत जो मुझे बहुत पसंद है
लिख चुके प्यार के गीत बहुत कवि अब धरती के गान लिखो।
लिख चुके मनुज की हार बहुत अब तुम उस का अभियान लिखो ।।
तू तो सृष्टा है रे पगले कीचड़ में कमल उगाता है,
भूखी नंगी भावना मनुज की भाषा में भर जाता है ।
तेरी हुंकारों से टूटे शत् शत् गगनांचल के तारे,
छिः तुम्हें दासता भाई है चांदी के जूते से हारे।
छोड़ो रम्भा का नृत्य सखे, अब शंकर का विषपान लिखो।।
उभरे वक्षस्थल मदिर नयन, लिख चुके पगों की मधुर चाल,
कदली जांघें चुभते कटाक्ष, अधरों की आभा लाल लाल।
अब धंसी आँख उभरी हड्डी, गा दो शिशु की भूखी वाणी ,
माता के सूखे वक्ष, नग्न भगिनी की काया कल्याणी ।
बस बहुत पायलें झनक चुकीं, साथी भैरव आह्वान लिखो।।
मत भूल तेरी इस वाणी में, भावी की घिरती आशा है,
जलधर, झर झर बरसा अमृत युग युग से मानव प्यासा है।
कर दे इंगित भर दे साहस, हिल उठे रुद्र का सिहांसन ,
भेद-भाव हो नष्ट-भ्रष्ट, हो सम्यक समता का शासन।
लिख चुके जाति-हित व्यक्ति स्वार्थ, कवि आज निधन का मान लिखो।।
एक बार फिर से दादा भाई का जन्मदिन की मंगल कामनाएं ।
रात के आसमान में बिखरती हुई चांदनी : मोनिका हठीला के काव्य संग्रह एक खुश्बू टहलती रही पर सुप्रसिद्ध कवि श्री राकेश खंडेलवाल जी का आलेख ।
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, आइएसबीएन नंबर 978-81-909734-2-7 मूल्य 250 रुपये
आलेख - श्री राकेश खंडेलवाल जी कवयित्री मोनिका हठीला
रात के आसमान में बिखरती हुई चाँदनी को पीकर कुछ सितारे लड़खड़ाते हुए पिघलते रहे रात भर। कुछ पिघले हुए सितारों की बूँदें टपकती हुई रजनीगन्धा के पत्तों पर आ गिरीं। भोर की पहली किरण ने जब उनको सहलाया तो निशिगन्धा के फूलों की साँसों को चूम कर, किरण के सोनहलेपन को अपने आप में समेट कर वे हवा की एक झालरी की उँगलियाँ पकड़े हुए चल पड़ीं चहल कदमियाँ करती हुईं।
चलते चलते हवाओं के साथ बहती हुई इन खुशबुओं की तरंगों को सीहोर का रास्ता मिल गया और वहाँ के पथ पर चलते हुए रास्ते इनको स्वत: ही ले गये मोनिका हठीला की कलम की नोक पर। उस कलम के मोहक स्पर्श से सँवर कर ये खुशबुएँ फिर निकल पड़ीं टहलती हुई और फिर विश्राम का नाम ही नहीं लिया और अब भी यह खुशबू टहलते हुए चल रही है।
यद्यपि मुझे मोनिका से मिलने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ परन्तु एक कवि या कवयित्री की पहचान तो उसके शब्दों से ही होती है। भावनाएँ नयी नहीं होतीं आदिकाल से मानव मन की संवेदनाएँ और भावनाएँ बदली नहीं हैं और न ही बदलेंगी। बदलता है तो केवल उन्हें शब्दों में पिरोने का कौशल, लक्षणा और व्यंजना का श्रंगार और अपनी बात को नये ढंग से कहने की कला।
मोनिका हठीला की रचनाओं में यह कौशल भली भाँति उभर कर आया है। सहज सीधे साधे शब्दों में बिना किसी आडंबर के अपनी बात कह पाने का जो हुनर उनकी रचनाओं में दृष्टव्य है वहाँ तक पहुँचने के लिये कड़ी साधना और लगन की आवश्यकता होती है। पारिवारिक जीवन के दायित्व में रहते हुए इस कौशल को खूबसूरती से निभाये रखना मोनिका की रचनाओं में दृष्टिगोचर होता है । अपने लेखन का जिक्र करते हुए मोनिका कहती हैं-
कलियों के मधुबन से
गीतों के छन्द चुने
सिन्दूरी क्षितिजों पर
स्वप्निल अनुबन्ध बुने
घिर आई रंग भरी शाम
एक गीत और तेरे नाम
तो एक और और एक और की श्रंखला बढ़ती रहती है और कभी विश्रान्ति के पल तलाश नहीं करती।
मन ऑंगन में करे बसेरा सुधियों का सन्यासी
मौसम का बंजारा गाये गीत तुम्हारे नाम
और तुम्हारे नाम लिखते लिखते जब यह कलम अपने आस पास देखती है तो व्यव्स्था की अस्तव्यस्तता और टूटते हुए सपनों के ढेरों से जुड़े हुए राजनीति से अछूती नहीं रह पाती
वे लिखती हैं-
सारे कौए ओढ़ के चादर आज बन गये बगुले..
अंधियारे ने रहन रख लिया आज उजाला है.
तो कवि हृदय की पीड़ा का आक्रोश सामने आ जाता है और अपनी आवाज़ में और आवाजों को सम्मिलित होने के लिये आमंत्रित करता प्रतीत होता है।
विरह के पलों के चित्रण में मोनिका ने अपनी अनूठी अभिव्यक्ति दी है-
तोता चुप, मैना उदास है, गुमसुम सोनचिरैया
कोयल भूल गई अपना सुर, भँवरा लगे ततैया
टूट गया पागल मीरा की साँसों का इकतारा
तेरे बिना मीत सूना है घर ऑंगन चौबारा
या फिर जब आंचलिक भाषा में परम्परागत चली आ रही गाथाओं और किंवदन्तियों को अपने भावों के साथ जोड़कर वे खूबसूरती से प्रस्तुत करती हैं तो उनकी कलम को बरबस ही नमन करना होता है-
विधना तू बावरो किने दी थारे कलम
विरहा लिख्यौ भाग म्हारे, आई न थारे सरम
हो पंख देता थे म्हारे उड़के आती द्वारे
मोनिका न केवल गीतों को अपने शब्दों से सजाती रही हैं बल्कि ग़ज़लों को भी उन्होंने नये लिबास पहनाये हैं। छोटी बहर हो या लम्बी, मोनिका ने अपनी बात अपने ही अंदाज़ में बयाँ की हैं। उनकी ग़ज़लों के चन्द अशआर उध्दृत किये बिना यह जिक्र अधूरा रह जायेगा। कुछ शेर खास तौर से
सुबह रोती मिली चाँदनी
रात जिससे सुहानी हुई
शबरी के राम एक न एक दिन तो आयेंगे
पलकों को पाँवड़ों सा बिछाये हुए हैं हम
लिल्लाह ऐसे देख कर मैला न कीजिये
बेदाग चाँदनी में नहाये हुए हैं हम
जिसने तुम्हारी राह में काँटे बिछाये थे
वो ही तुम्हारी ऑंख का तारा है इन दिनों
आप के हुक्म पर होंठ सी तो लिये
गीत पायल सुनाये तो मैं क्या करूँ
और
मैने जाना जबसे तुमको
खुद से ही अंजान हो गई.
मैने केवल कुछ ही अशआर इसलिये चुने कि अगर पसन्द के सभी शेरों का जिक्र यहाँ करता तो कई ग़ज़लें पूरी की पूरी यहाँ लिखना पड़ जातीं। गीत, ग़ज़लों के साथ साथ मुक्तकों में भी मोनिका ने अपनी शैली को एक अलग पहचान दी है। मोनिका के मुक्तकों ने जहाँ भारत के कवि सम्मेलनों के हर मंच पर अपनी छाप छोड़ी है वहीं मूर्धन्य साहित्यकारों और कवियों से भी वाहवाही बटोरी है। उनका हर मुक्तक एक दूसरे से बढ़ कर है।
मुझे अत्यंत हर्ष और गर्व का अनुभव हो रहा है कि मोनिका के गीत, ग़ज़लों और मुक्तकों को पढ़ने का प्रथम अवसर मुझे प्राप्त हुआ और उनकी रचनाओं के सन्दर्भ में मैं कुछ कह सका।
खुशबू टहलती रही के पश्चात आगामी संकलनों की सभी काव्य प्रेमियों को प्रतीक्षा रहेगी ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। मोनिका को लेखन के नये आयाम छूने की शुभकामनाओं के साथ आशीष ।
राकेश खंडेलवाल
14205-पंच स्ट्रीट
सिल्वर स्प्रिंग , मैरीलेंड
( यू. एस. ए )
301-929-0508
वैदेही की तड़प, उर्मिला की पीर, और मांडवी की छटपटाहट : विरह के रंग (काव्य संग्रह) कवयित्री सुश्री सीमा गुप्ता, समीक्षा श्री रमेश हठीला
विरह के रंग (काव्य संग्रह) ISBN: 978-81-909734-1-0 सीमा गुप्ता
मूल्य : 250 रुपये प्रथम संस्करण : 2010 प्रकाशक : शिवना प्रकाशन पी.सी. लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट बस स्टैंड, सीहोर -466001(म.प्र.) दूरभाष 09977855399
लेखिका का ईमेल पता : seemagupta9@gmail.com
पुस्तक समीक्षा द्वारा श्री रमेश हठीला
श्री रमेश हठीला शिवना प्रकाशन सुश्री सीमा गुप्ता
सुश्री सीमा जी के काव्य संग्रह विरह के रंग का सप्त रंगी इन्द्रधनुष का यह काव्य गुच्छ सिर्फ शब्दों का मकड़ जाल नहीं अपितु उस छटपटाती मकड़ी की अपनी वेदना है, जो स्वयं जाल बुन कर उसमें उलझ स्वयं को मुक्त करना चाहती है, इनकी रचनाओं में प्यासी मीन सी अकुलाहट, छटपटाहट है वहीं स्वाती बूंद को सीपी में समाने की व्याकुलता स्पष्ट दृष्टि गोचर होती है। प्यार का पुष्प विरह की समीर बिन सुवासित हो ही नहीं पाता । विरह का रंग, अनुभव और अनुभूति का वह कल कल करता झरना है जो कभी ऑंखों से तो कभी आहों की राह से वेगवती सरिता सा सागर में समाहित होने मदांध गज की भाँति सबको रोंदता बढ़ता चला जाता है ।
वियोगी होगा पहला कवि आह से निकला होगा गान, इन ध्रुव पंक्तियों का शाश्वत दर्शन होता है विरह के रंग काव्य संकलन में । त्रेता, द्वापर और आधुनिक युग की अनुभूति का साँगो पाँग दर्शन है विरह के गीत । वैदेही की तड़प, उर्मीला की पीर, और मांडवी की छटपटाहट को ऑंसू के धागे में पिरोने का साहस या तो प्रेम दिवानी मीरा ने दिखाया, या उध्दव समक्ष ब्रज गोपिकाओं ने ।
सीमा जी के विरह के रंग हर संवेदनशील मन को अपने से प्रतीत होते हैं । पाठक पढ़ते पढ़ते स्वयं ही रचनाओं में समाहित हो एकाकार होने लगता है । काव्य कृति को व्याकरण की कसौटी पर न कसते हुए मन की कसौटी पर कसना होगा । क्योंकि जहाँ पर मन होता है वहाँ केवल भावनाएँ होती हैं, न कोई व्याकरण और न व्याकरण की कसौटियाँ । हालाँकि ये बात भी सच है कि व्याकरण की कसौटी पर खरा उतरना ही कविता का मानदंड होता है, किन्तु, सीमा जी की कविताएँ आत्मा की छटपटाहट की कविताएँ हैं, और ऑंसू जब बहते हैं तो किसी नियम का पालन नहीं करते । लेकिन भविष्य में सीमा जी को भावों और व्याकरण के संतुलन पर और ध्यान देना होगा ।
विरह के रंग की कविताएँ वे कविताएँ हैं जिनको पढ़ने वाला जब इनके भावों में डूबता है तो अनुभव और अनुभूति की मदिर-मदिर रश्मियाँ स्वत: ही अधरों पर मुखरित हो थिरकने लगती हैं, और विरही मन कह उठता है ।
मुझसे मुँह मोड़ कर तुमको जाते हुए
मूक दर्शक बनी देखती रह गई
क्या मिला था तुम्हें मेरा दिल तोड़कर
जि़दगी भर यही सोचती रह गई
इसी प्रकार का बिम्ब हमें तुम्हारा है रचना में भी दिखाई पड़ता है, बानगी देखें
जो भी है सब वो तुम्हारा है
यह दर्द कसक दीवाना पन
यह रोज़ की बेचैनी उलझन
यह दुनिया से उकताया मन
यह जागती ऑंखें रातों में
तन्हाई में मचलन तड़पन
सीमा जी की रचनाओं में जहाँ राग, अनुराग, वैराग्य का समागम है, वहीं आकाश पर चमकने वाली दामिनी की तड़प, हीर, सोहनी और मीरा की पीर, शब्दों का सैलाब बन कर उन्मुक्त भाव से अपने को अभिव्यक्त कर रही है । एक विचित्र सी प्यास, जिसे हम मृग मरीचिका कहें तो कोई भी अतिशयोक्ति नहीं होगी । विरह की वेदना, दग्ध होलिका की भाँति दिखाई तो देती है किन्तु उसे महसूस एक वियोगी ही कर सकता है । एक काव्य सृजक ही बाँसुरी की वेदना को कल्पना की छैनी से उकेर कर उसे शब्दों में ढाल सकता है, ये बात सीमा जी की कविताओं से पुष्ट होती है । आज अगर प्रेम अजर अमर है तो वह वियोग के बल पर ही है । प्रेम तो परजीवी अमरबेल की भाँति है, वियोग का वृक्ष ही उसे अपने ऊपर आच्छादित किये हुए है । विरह के रंग ये काव्य संग्रह भी प्रेम की लोकप्रियता में वियोग या विरह के महती अवदान की बात की पुष्टि करता है। सीमा जी के गीत हों या ग़ज़ल दोनों ही क्षेत्रों में विरह की अग्नि समान रूप से दमकती है । ग़ज़ल की बानगी अपनी कहानी में देखें
बहुत तलब है बहुत तड़प है और कसक
कोई नहीं है उसका सानी सुनती हूँ
एक उदासी दिल पर मौत के जैसी थी
लेकिन अब जीने का ठानी सुनती हूँ
'एक उदासी दिल पर मौत के जैसी थी, लेकिन अब जीने की ठानी सुनती हूँ' इन पंक्तियों में मुश्किलों के घटाटोप तिमिर को कवि मन चुनौती दे रहा है । चुनौती इस बात की, कि जीवन कभी समाप्त नहीं होता । अंधेरा, उदासी ये सारी चीजें समायिक हैं और जीवन इन सबसे ऊपर होता है । वो कभी भी नहीं हारता । इसीलिये तो वो कहता है 'लेकिन अब जीने की ठानी'। सीमा जी की कविताएँ भले ही विरह की कविताएँ हैं लेकिन इन कविताओं में पराजय का बोध कहीं नहीं है । इन कविताओं में विरह तो है लेकिन वो विरह पलायन का रास्ता नहीं पकड़ रहा है, और न दीनता की ओर अग्रसर होता दिख रहा है, यही तो कृष्ण ने कहा था अर्जुन से न दैन्यं, न पलायनम । सीमा जी की कविताओं की जो सबसे बड़ी विशेषता है वो यही है और यही एक बात इनकी विरह की कविताओं को सामान्य विरह की कविताओं से अलग करती है । कवि मन हर उदासी को तोड़ देना चाहता है तभी तो कह उठता है-
बेचैनियों को करके दफ्न
दिल के किसी कोने में,
रागिनियों से मन को बहलाया जाए
खामोशी के आगोश से
दामन को छुड़ा कर, ज़रा,
स्वर को अधरों से छलकाया जाए
अंतर्मन, एहसास, तेरे जाने के बाद, मौन जब मुखरित हुआ, यादों की पालकी में रचनाकार ने अपने मन की समग्र पीड़ा को कांगा की धरती पर, कलम की पिचकारी बना विरह के रंग से सजाया है । इन कविताओं में एक मौन है, एक विचित्र सी खामोशी है जो कविताओं के समाप्त होने के बाद भी गूँजती रहती है, ठीक वैसे ही जैसे किसी तो रंफ्तार रेल के गुज़र जाने के बाद पहाड़ों में उसकी प्रतिध्वनि देर तक गूँजती है। ये सन्नाटों की कविताएँ हैं ।
मीनाक्षी जोशी जी द्वारा किसी लेख में लिखी गई बात याद आ रही है जो उन्होंने विरह पर लिखी है ''विरह प्रेम की जागृति है । विरह के पदों में सबसे पहली बात है चारों ओर के वातावरण में सूनेपन, एकाकीपन और विषाद की भावना । वर्षा ऋतु में जब बादल छाते हैं, वज्रपात होता है, अन्धकार भर जाता है, घर सूना रहता है तब नयन और हृदय दुख की जिस घनी छाया में डूबे रहते हैं उसकी अभिव्यक्ति अनुभूति से ही सम्भव होती है । '' मीनाक्षी जोशी जी की बात का उध्दरण यहाँ देने के पीछे प्रयोजन ये है कि सीमा जी कविताएँ उस अनुभूति की अभिव्यक्ति करने में पूरी तरह से सफल रहीं हैं, जिसके बारे में मीनाक्षी जी ने लिखा है ।
सीमाजी की यह प्रथम काव्य कृति है, मातृ भाषा हिन्दी के प्रति उनका यह अगाध नेह इसी प्रकार बना रहे, यही माँ वीणापाणी से कामना है । पाठक वृंद विरह के रंग को अपना आशीष प्रदान करेंगें, इसी कामना के साथ ।
-रमेश हठीला
मुकेरी लाइन, सीहोर
मध्यप्रदेश-466001
संपर्क : 09977515484
दीपक चौरसिया की अनुभूतियां की कविताएँ मनन माँग रही हैं - डॉ. मोहम्मद आज़म
-डॉ. मोहम्मद आज़म दीपक चौरसिया मशाल
इससे पहले कि मैं दीपक चौरसिया मशाल की शाइरी पर अपना खयाल पेश करूँ मैं आज़ाद नम या छंद मुक्त कविता के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ । गालिब ने कहा था- बकर्दे-शौक नहीं जर्फे-तंगनाए ग़ज़ल, कुछ और चाहिये वुसअत मेरे बयाँ के लिये। (बकर्दे-शौक: इच्छानुसार, ज़र्फे-तंगनाए ग़ज़ल: ग़ज़ल का तंग ढांचा, वुसअत: विस्तार ।)
गालिब ही क्यूँ हर शाइर को कभी न कभी यह एहसास होता है वह ग़ज़ल की पाबंदियों में फंसकर अपनी बात, खुल कर नहीं कह पाता । सिर्फ ग़ज़ल ही क्यों पाबंद नमों में भी कैद महसूस करता है कि वह जो कहना चाहता है वह दिल भर, जी भर कर कह नहीं पा रहा है । शायद इसी उलझन की वजह से मुक्त कविताओं या आज़ाद नमों का सिलसिला शुरू हुआ होगा । इसमें आज़ादी यह रहती है कि कवि अपनी भावनाओं को शब्दों के बेहिसाब गिलाफ पहना कर कांगा पर सजा देता है ताकि दिल का गुबार पूरी तरह से निकल सके ।
दूसरी वजह मुझे यह महसूस होती है कि अकसर कविशाइर ग़ज़लकारी की बारीकियों से भिज्ञ ही नहीं होते, उन्हें आज़ाद नग्मों के रूप में भाग निगकलने का रास्ता (यानी राहे फरार) मिल जाता है । अर्थात अपनी कम फहमी को ढाँपने का एक जरिया ।
ऊपरी दोनों दलीलों के ज़रिये मैं कह सकता हूँ कि मुक्त कविताएँ ज़रूरी भी हैं और मजबूरी भी । बहुत से शाइरों ने बेपनाह खूबसूरत और मुकम्मल, दिल पर असर करने वाली, जेहन को झकझोर देने वाली आज़ाद नमें लिखी हैं । जिन्हें पढने के बाद यकीन हो जाता है कि वाकयी यह बातें पाबंद नग्मों या ग़ज़लों के माध्यम से कही नहीं जा सकती थीं । फिर गालिब की शिकायत जाया लगती है । मगर क्या कहें कि अक्सर (ज्यादातर) ऐसी छंद मुक्त कविताएँ पढने को मिलती हैं जो लिहाज से मुक्त होती हैं.. फन से मुक्त, हुनर से मुक्त, खयालों से मुक्त, असर से मुक्त, तब लगता है कि शाइर वांकयी फने शायरी से राहे फरार इख्तियार कर गया है, यानी भगोड़ा शाइर है । वैचारिक स्तर पर न उसके पास कुछ है और न ही साहित्यिक चेतना ही उसके पास है ।
किसी भी रचनाकार का उद्देश्य सिर्फ पढ़ने वालों पर अपने विचारों का असर छोड़ना ही होता है । अगर उसमें वह कामयाब नहीं है तो सारी मेहनत बेकार है। फिर आज़ाद नमों में सबसे बड़ी खराबी ये होती है उसे पढ़ते वंक्त किसी 'रिद्म' का ना तो आभास होता है औन न ही कुछ ज़ेहन में महफूज़ रहता है, जो कि शायरी की बुनियादी आवश्यकताएँ हैं । वरना तो बेहतर है गद्य लिखा जाए (गद्य भी कुछ लोग इस प्रकार लिखते हैं कि उसमें शायरी का लुत्फ आ जाता है, खैर ।) । इसीलिये आज़ाद नज्म का मैं जबर्दस्त प्रशंसक कभी नहीं रहा । नसरी नज्म अर्थात गद्यात्मक पद्य कभी कभी तो उल्टी हो जाती है, यानी पद्यात्मक गद्य बन जाती है, अर्थात पद्य ही नहीं रहती ।
छंद मुक्त कविताओं को इसलिये इस प्रकार लिखा जाना चाहिये कि कि पढ़ने वाला, पढ़ते रहने का पाबंद हो जाए । शुरू करे तो खत्म तक पहुँचकर ही दम ले । वरना होता यह है कि मुक्त कविताओं से पाठक ही मुक्त हो जाता है, यानी कुछ लाइनें पढ़कर भाग खड़ा होता है । इसीलिये ऐसी कविताओं में शब्दों का चयन लाजवाब होना चाहिये और उनकी तरतीब इतनी सुंदर होनी चाहिये कि पाठक एक मोहपाश में बंध जाए और अंत में उसे आभास होना चाहिये कि उसने एक सार्थक रचना पढ़ी है ।
आइये अब बात करते हैं दीपक चौरसिया 'मशाल' की 'अनुभूतियाँ' की । जैसा कि मैं पहले ही जिक्र कर चुका हूँ छंदमुक्त कविताओं का मैं जबरदस्त फैन नहीं रहा इसलिये अक्सर सरसरी नारों से पढ़ता हूँ । 'अनुभूतियाँ' पर भी मैंने इधर उधर से एकाध कविता पर उचटती नार डाली तो मुझे फौरन ही एहसास हो गया कि ये कविताएँ मनन माँग रही हैं, ये गंभीरता चाह रही हैं । इन्हें ऑंख खोलकर नहीं बल्कि दिल व दिमांग खोलकर पढ़ने की आवश्यकता है । फिर यह हुआ कि यहाँ वहाँ से पढ़ने के बजाए मेरा मन हुआ कि प्रारंभ से अंत तक पुस्तक पढ़ूँ । पहली कविता ने मेरा मन मोह लिया । माँ एक शब्द नहीं माँ एक कायनात है । आजकल तो कवियों और शाइरों में एक होड़ सी लग गई है और सब इस नाम को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं । क्योंकि माँ हर इन्सान के लिये आदरणीय शब्द है और वह अपनी हस्ती के लिये उसका ही क़र्जदार होता है । मशाल ने भी 'आज भी' तथा 'मुझे तेरी ज़रूरत है' में माँ की महत्ता दर्शायी है ।
दुनिया की हर ऊँचाई तेरे कदम चूमती है ।
मुहब्बत एक ऐसी अनुभूति है जिससे कोई भी मानव हृदय उद्वेलित हुए बिना नहीं रहा सकता । मशाल की कविताओं में भी मुहब्बत मौजूद है मगर अधिकतर निराशाजनक पहलू के संग । 'कैसे हो' कविता में उनकी निराशा उनके और उनकी प्रेयसी में मौजूद विसंगतियों के कारण है ।
'महकती हुई भीनी खुश्बू सी तुम और बिखरी हुई ख्वाहिश सा मैं तुम अंबर में उड़ना चाहते मैं ज़मीं से जुड़ना चाहता मुहब्बत मुमकिन कैसे हो ।'
कवि मन अत्यंत भावुक होता है । कवि के निकट सबसे निंदनीय कृत्य इंसानों द्वारा इंसानों पर अत्याचार होता है । वह समाज को संदेश देता है, भाईचारे को सर्वोपरि बताता है, उसका ध्येय सिर्फ एक सुंदर एवं स्वस्थ समाज की संरचना, एक बेहतर विश्व की कल्पना होता है । यही कबीर, रहीम, मीर, ंगालिब और तमाम प्रसिध्द एवं अप्रसिध्द शायर व कवि कह गये हैं । मशाल ने भी यह प्रयास किया है । 'नये सिरे से' में कहते हैं-
देव बसते थे कभी यहाँ पर अब शैतानों की बस्ती है जीवन का कोई मूल्य नहीं और मौत मुंफ्त में बँटती है नये सिरे से सोचें अब हम ।
जीवन क्या है यह क्यूँ है ऐसे सवाल मनुष्य के मन में आते रहते हैं । जन्म लेना, उम्र गुजारना, फिर मर जाना बाद में खप जाना, यह क्या सिलसिला है ? अनंत काल से चलता आ रहा है । इंसान मौलिक प्रश्न से उलझा रहा है ..जीवन क्या है । मशाल ने बड़ी कामयाबी से राज़ खोल दिया है, बड़ी आसानी से 'शीर्षक' में कहते हैं क्योंकि जीवन कविता नहीं एक पहेली है और पहेली का कोई शीर्षक नहीं होता ।
कविता लिखना इतना आसान नहीं होता, कई बार तो कवि को उसी अवस्था से ग़जारना पड़ता है जिनसे बच्चे को जन्म देते समय माँ को ग़ुजारना होता है । प्रसव पीड़ा से इसकी समानता दें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । 'थकावट' में यह पीड़ा महसूस की जा सकती है ।
विदेश में रहकर भी भारत की मौजूदा राजनैतिक वातावरण से विचलित है, इस बात से खिन्न है कि बजाए देश को प्रगति के पथ पर ले जाने के प्रयास करने के, लोग मंदिर मस्जिद में उलझकर देश का सत्यानाश कर रहे हैं । वह इसे राजनैतिक पतन मान रहे हैं ।
कई संबंध मात्र समझौतों के बलबूतों पर चलते हैं । दो व्यक्ति सम स्वभाव के हो नहीं सकते इसीलिये मेरे विचार से संबंधों में विश्वास से कहीं यादा समझौतों की आवश्यकता है । सामंजस्य तभी बनेगा, संबंध तभी नहीं टूटेगा । कुछ संबंध इतने उलझे होते हैं कि उन्हें चाहकर भी तोड़ नहीं सकते, दूसरे शब्दों में उन्हें झेलना ही पड़ता है । मशाल ने 'समझौता' में यही बात निहायत बेबाकी से कह दी है ।
जब किस्मत में उनके साथ रहना लिखा है तो क्यों न उनसे समझौता कर लूँ ।
दरअस्ल 'अनुभूतियाँ' में उन्होंने अपनी तमाम अनुभूतियों को अक्षरों एवं शब्दों के माध्यम से पेश कर दिया है । हर विषय के रंगों से शाइरी के कैनवस को रंगीन कर दिया है । इनके यहाँ अगर गम, दर्द, विरक्ति, निराशा मजबूरी, समझौतों के धुंधले और काले शेड दिखते हैं तो वहीं प्रसन्नता, आशा की बेहद चमकदार किरणें भी नार आती हैं । इनमें लिखने की ललक प्रतीत होती है । इनमें कसक, तड़प, सच्चाई, बंगावत, आग, जबात, इश्क, तहज़ीब, देशभक्ति, तंज व व्यंग्य, रिश्तों की पाकीज़गी का ध्यान आदि आदि तमाम वह गुण हैं जो एक व्यक्ति को कवि शाइर का दरजा प्रदान करते हैं । मेरी बस एक सलाह है कि निरंतर फन के उस्तादों को पढ़ते रहें और निरंतर कुछ नया गढ़ते रहें । उनमें योग्यता है बाकी रियाज़ जारी रखें तो मुझे विश्वास है उन्हें एक विशिष्ट स्थान प्राप्त हो जाएगा ।
टी.एस. इलियट ने कहा था 'रचनाकार को निरंतर प्रयासरत रहना चाहिये न जाने कब उसके दिल दिमाग की कोई खिड़की खुल जाए और अपने को व्यक्त करने का कोई रास्ता मिल जाए ।'
इस आशा के साथ कि भविष्य में उनकी रचनाएँ और प्रकाशित होती रहेंगीं और वह एक स्थापित कवि बन जाएँगे (यह कोई दुआ नहीं है बल्कि उनकी संभावनाओं को समझकर किया गया उद्गार है ) अनुभूतियाँ के लिये उन्हें मुबारकबाद प्रेषित करता हूँ ।
शिवना प्रकाशन के होली परिशिष्ट का विमोचन
साहित्यिक संस्था शिवना प्रकाशन द्वारा होली के अवसर पर प्रकाशित होली परिशिष्ट होली का हंगामा का विमाचन जिला जनसम्पर्क अधिकारी श्री एल आर सिसौदिया ने किया । कार्यक्रम की अध्यक्षता गल्ला व्यापारी संघ के अध्यक्ष श्री कैलाश अग्रवाल ने की विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार श्री रामनारायण ताम्रकार तथा बैंक कर्मी श्री उमेश शर्मा उपस्थित थे ।
शिवना प्रकाशन द्वारा होली के पर्व को लेकर एक परिशिष्ट का प्रकाशन साहित्यकार श्री रमेश हठीला के संपादन में किया गया है । इस परिशिष्ट में होली को लेकर उपाधियां तथा अन्य सामग्री का प्रकाशन किया गया है । होली का हंगामा नाम से प्रकाशित इस परिशिष्ट के सहायक संपादक श्री पंकज सुबीर तथा श्री अनिल राय हैं । इस परिशिष्ट का विमोचन पी सी लैब पर आयोजित एक समारोह में किया गया ।
सर्वप्रथम अतिथियों ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया तथा गुलाल अर्पित की । तत्पश्चात अतिथियों का स्वागत पुष्प माला से डॉ आजम, सनी गोस्वामी, हरिओम शर्मा दाऊ ने किया ।
सोनू ठाकुर ने सभी अतिथियों को अबीर गुलाल का तिलक कर सभी उपस्थितों का स्वागत किया ।
परिशिष्ट का विमोचन संपादक रमेश हठीला तथा सह संपादक अनिल राय ने अतिथियों के कर कमलों से संपन्न करवाया ।
परिशिष्ट के बारे में बोलते हुए पत्रकार शैलेश तिवारी ने होली की परंपरा के निर्वाहन के लिये निकाले गये इस अंक पर विस्तार से प्रकाश डाला । मुख्य अतिथि श्री एल आर सिसौदिया ने कहा कि शालीन हास्य के माध्यम से होली के अवसर पर शहर के गणमान्य नागरिकों को उपाधियां देने की एक शिष्ट परंपरा रही है जिसका शिवना ने सीहोर में निर्वाह किया है । श्री रामनारायण ताम्रकार ने कहा कि शिवना प्रकाशन ने होली का हंगामा प्रकाशित कर उस कमी को पूरा करने की कोशिश है जो पिछले कुछ सालों से बन गई है । श्री उमेश शर्मा ने होली का हंगामा की मुक्त कंठ से सराहना करते हुए अंक को सामयिक बताया । अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री कैलाश अग्रवाल ने कहा कि साहित्यकारों ने होली को अपनी कलम के माध्यम से और रंगीन कर दिया है । उन्होंने होली के हंगामा को शिवना प्रकाशन द्वारा शहर के गणमान्य नागरिकों के साथ खेली गई शालीन होली निरूपित किया । अंत में शिवना के श्री हरीओम शर्मा दाऊ ने आभार व्यक्त किया । कार्यक्रम का संचालन पंकज सुबीर ने किया । कार्यक्रम में राजकुमार गुप्ता, अनिल पालीवाल, प्रदीप समाधिया, हरीओम शर्मा, राजेंद्र शर्मा, चंद्रकांत दासवानी, जयंत शाह, हितेन्द्र गोस्वामी, सुनील भालेराव, सूर्यमणी शुक्ला, संजय धीमान, सुनील शर्मा, नरेश तिवारी, बिल्लू समाधिया, सोनू ठाकुर, सुरेंद्र राठौर, मनोज मामा, सनी गोस्वामी, सुधीर मालवीय आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे ।
शिवना के सरस्वती पूजन में शामिल हुए बुध्दिजीवी, शिवना के नये काव्य संग्रह अनुभूतियां का विमोचन
अग्रणी साहित्यिक संस्था शिवना ने वसंत पंचमी के अवसर पर ज्ञान की देवी माँ सरस्वती का पूजन समारोह आयोजित किया । आयोजन में शहर के साहित्यकार, पत्रकार, शिक्षाविद तथा बुध्दिजीवी शामिल हुए । स्थानीय पीसी लैब पर आयोजित सरस्वती पूजन तथा गोष्ठी के कार्यक्रम में शिक्षाविद् प्रो: डॉ. भागचंद जैन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे । कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी की प्राध्यापक डॉ. पुष्पा दुबे ने की ।
सर्वप्रथम पंडित शैलेश तिवारी के मार्गदर्शन में शिवना के संस्थापक वरिष्ठ साहित्यकार श्री नारायण कासट ने सभी अतिथियों के साथ माँ सरस्वती का विधिपूर्वक पूजन किया ।
तथा सभी उपस्थित जनों ने माँ सरस्वती को पुष्पाँजलि अर्पित की ।
प्रथम खंड में विचार गोष्ठी का शुभारंभ करते हुए संचालक के रूप में श्री नारायण कासट ने वसंत पंचमी तथा निराला जयंती पर विस्तृत प्रकाश डाला । वरिष्ठ साहित्यकार श्री कासट लम्बी बीमारी से लगभग ढाई साल तक ग्रस्त रहने के बाद किसी साहित्यिक आयोजन में उपस्थित हुए । वे पिछले ढाई साल से लगातार बिस्तर पर ही रहे । उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि मुझे तो अब लग ही नहीं रहा था कि मैं अब वापस आ पाऊंगा किन्तु आज पुन: यहां आकर मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरा नवजीवन हो गया है । ये सबकी शुभकामनाओं का ही फल है ।
उन्होंने कहा कि जो पुरातन हो चुका है उसका अंत और नूतन का प्रारंभ ही बसंत है । इसे हम कह सकते हैं कि पुरातन का बस अंत ही बसंत हैं ।
इस अवसर पर शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित नये काव्य संग्रह इंग्लैंड के भारतीय मूल के कवि श्री दीपक चौरसिया मशाल के अनुभूतियाँ को शिवना के श्री रमेश हठीला ने माँ सरस्वती के चरणों में अर्पण किया । साथ ही भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित पंकज सुबीर के कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी को भी मां सरस्वती को अर्पित किया गया ।
मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रो. भागचंद जैन ने कहा कि वसंत बताता है कि हमको प्रेम बाँटना सीखना चाहिये । प्रेम और स्नेह बाँटने से मनुष्य जीवन सफल हो जाता है ।
अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो. डॉ पुष्पा दुबे ने कहा कि वसंत पंचमी सरस्वती के अवतरण का दिवस है और हमारी लेखनी को मां सरस्वती के आशीर्वाद की आवश्यकता हमेशा ही बनी रहती है । उन्होंने कहा कि साहित्यकार के लिये संवेदनशील होना सबसे आवश्यक है और ये संवेदना उसे माँ सरस्वती ही प्रदान करती हैं । उन्होंने पंकज सुबीर के कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी पर भी चर्चा की ।
कार्यक्रम के दूसरे खंड में आयोजित काव्य गोष्ठी का शुभारंभ कु. रागिनी शर्मा ने माँ सरस्वती की वंदना के साथ किया । रागिनी शर्मा ने श्री नारायण कासट के आग्रह पर लिंगाष्टक का भी सस्वर पाठ किया । जिस पर श्रोता मंत्रमुग्ध हो गये । उल्लेखनीय है कि रागिनी प्रदेश के वरिष्ठ छायाकार श्री राजेंद्र शर्मा की सुपुत्री हैं तथा संस्कृत में विशेष शिक्षा प्राप्त कर रही हैं । कालीदास के संस्कृत नाटक में अभिनय भी कर चुकी हैं ।
कवि गोष्ठी में लक्ष्मण चौकसे ने अपनी छंद मुक्त कविता आगे बढ़ता चल, श्री द्वारका बाँसुरिया ने अपना गीत जीवन रथ के सुख दुख दो पहिये चलना जीवन का सार, कवि लक्ष्मीनारायण राय ने दर्दीली जिंदगी और घुटन भरे गीत, प्रस्तुत की ।
रागिनी शर्मा ने कविता आज रायाभिषेक हुआ था श्रीराम का, रमेश हठीला ने गीत मेरे अगर गाएँ मेरे अधर, ये तो एहसान होगा मेरे गीत पर, गूंगे प्राणों को मिल जाए स्वर माधुरी गुनगुना दें मेरे गीत को आप गर, श्री शैलेश तिवारी ने छंदमुक्त कविता माँ शारदे को धन्यवाद और पंकज सुबीर ने गीत तेज समय की नदिया के बहते धारे हैं, यायावर हैं, आवारा हैं, बंजारे हैं प्रस्तुत किये ।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार श्री नारायण कासट ने अपने कई मुक्तक पढ़े दिल भी ना साथ गुँथे जब तक फूलों का हार अधूरा है, जैसे रागों के प्राण गिना स्वर का संसार अधूरा है, और श्रोताओं के बहुत अनुरोध पर उनहोंने अपनी सुप्रसिद्ध नथनिया गजल का सस्वर पाठ किया । उनका एक मुक्तक-
आंखों में वासंती आमंत्रण आंज कर,
जूड़े में मदमाती मलय गंध बांध कर
गुपचुप सन्नाटे में निकली अभिसारिका,
संयम की लजवंती देहरी को लांघकर
अंत में शिवना की ओर से जयंत शाह ने आभार व्यक्त करते हुए अतिथियों को धन्यवाद दिया । कार्यक्रम में सर्वश्री अनिल पालीवाल, राजेन्द्र शर्मा, हितेन्द्र गोस्वामी, उमेश शर्मा, चंद्रकांत दासवानी, श्रीमती जैन, नरेश तिवारी, सुनील शर्मा, राजेश सेल्वराज, सुरेंद्र ठाकुर, सनी गोस्वामी, सुधीर मालवीय सहित प्रबुध्द श्रोता उपस्थित थे ।