Jalprantar By Pankaj Parashar


India Inside


शिवना प्रकाशन की नई पुस्तकें







शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 3, अंक : 10 त्रैमासिक : जुलाई-सितम्बर 2018

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक, सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra , प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी Neeraj Goswamy , संपादक पंकज सुबीर Pankaj Subeer , कार्यकारी संपादक, शहरयार Shaharyar , सह संपादक पारुल सिंह Parul Singh के संपादन में शिवना साहित्यिकी का वर्ष : 3, अंक : 10 त्रैमासिक : जुलाई-सितम्बर 2018 इस अंक में आवरण कविता पानी / प्रेमशंकर शुक्ल Premshankar Shukla , संपादकीय / शहरयार Shaharyar , व्यंग्य चित्र / काजल कुमार Kajal Kumar, विशेष पुस्तक- दो लोग / गुलज़ार Gulzar / समीक्षक : पंकज सुबीर Pankaj Subeer , पीढ़ियाँ आमने-सामने- फुगाटी का जूता / मनीष वैद्य Manish Vaidya , समीक्षक : रमेश उपाध्याय Ramesh Upadhyaya, विमर्श- दस प्रतिनिधि कहानियाँ / सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra , विमर्श : डॉ. सुशील सिद्धार्थ Sushil Siddharth , पेपर से पर्दे तक- सिनेमा एक कला और तकनीक, कृष्णकांत पण्ड्या Krishna Kant Pandya , जो पिछले दिनों पढ़ा- ठगलाइफ़ / प्रितपाल कौर Pritpal Kaur , समीक्षक : सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra , शोध-आलेख- शब्द पखेरू / नासिरा शर्मा Nasera Sharma , शोध : शगुफ्ता यास्मीन, नैनसी का धूड़ा / स्वयं प्रकाश Swayam Prakash , शोध : श्वेता बर्नवाल, नई पुस्तक- ऑफ़ द स्क्रीन / ब्रजेश राजपूत Brajesh Rajput , पुस्तक चर्चा- शब्द, शुद्ध उच्चारण और पदभार / ज़हीर क़ुरैशी / डॉ. आज़म Mohammed Azam , आचमन, प्रेम जल से / प्रतिमा अखिलेश Pratima Akhilesh / ई. अर्चना नायडू Archana Nayudu , पेड़ों पर हैं मछलियाँ / अमरेंद्र मिश्र Amrendra Mishra / प्रतिभा चौहान Pratibha Chauhan , एक थका हुआ सच / मंजू महिमा Manju Mahima / अतिया दाऊद Devi Nangrani , समीक्षा- अभी तुम इश्क़ में हो / प्रो. डॉ. मुहम्मद नौमान ख़ाँ / पंकज सुबीर, स्वप्नपाश / मीरा गोयल Meera Goyal / मनीषा कुलश्रेष्ठ Manisha Kulshreshtha , रेखाएँ बोलती हैं / राकेश कुमार Rakesh Kumar / गीताश्री Geeta Shree, पागलखाना / ब्रजेश राजपूत Brajesh Rajput / डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी Gyan Chaturvedi , मोगरी / डॉ. रेवन्त दान बारहठ Dr-Rewant Dan / मुरारी गुप्ता Murari Gupta , उच्च शिक्षा का अंडरवर्ल्ड / प्रकाश कांत Prakash Kantt / जवाहर चौधरी Jawahar Choudhary , मैं शबाना / फारूक़ आफरीदी Farooq Afridy Jaipur / यूसुफ़ रईस Yusuf Rais , आवरण चित्र राजेंद्र शर्मा बब्बल गुरू Babbal Guru , डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी Sunny GoswamiSunil Suryavnshi । आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा। ऑन लाइन पढ़ें-

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वैश्विक हिन्दी चिंतन की त्रैमासिक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका "विभोम-स्वर" का वर्ष : 3, अंक : 10 त्रैमासिक : जुलाई-सितम्बर 2018

मित्रों, संरक्षक तथा प्रमुख संपादक सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra एवं संपादक पंकज सुबीर Pankaj Subeer के संपादन में वैश्विक हिन्दी चिंतन की त्रैमासिक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका "विभोम-स्वर" का वर्ष : 3, अंक : 10 त्रैमासिक : जुलाई-सितम्बर 2018, संपादकीय, मित्रनामा, साक्षात्कार- सुमन घई Suman K. Ghai के साथ सुधा ओम ढींगरा की बातचीत। कथा कहानी- बत्तीस कलाओं के लीलाधारी- भरत प्रसाद Bharat Prasad , और कुलसूम मर गई...- ज़ेबा अलवी Zeba Alavi , मास्साब- डॉ. कविता विकास Kavita Vikas , गुलशन कौर- देवी नागरानी Devi Nangrani , तवे पर रखी रोटी- डॉ.विभा खरे , नम्बर प्लेट- राजेश झरपुरे Rajesh Zarpure । लघुकथाएँ- खिलौना- अमरेंद्र मिश्र Amrendra Mishra , मूर्तिकार- सुरेश सौरभ, कट्टरपंथी - राहुल शिवाय Rahul Shivay , बिखरी पंखुड़ियाँ - ज्योत्सना सिंह , भैंस के आगे बीन बजाना - गोवर्धन यादव Goverdhan Yadav , एक लाश-एक चेहरा- अमरेंद्र मिश्र। भाषांतर- एक मुक़दमा और एक तलाक़, यीडिश कहानी, मूल कथा : आइज़ैक बैशेविस सिंगर, अनुवाद : सुशांत सुप्रिय Sushant Supriye । व्यंग्य- टर गए हरीशचंद्र, प्रेम जनमेजय । दृष्टिकोण- सिविक सेन्स, कृष्ण कान्त पण्ड्या Krishna Kant Pandya । व्यक्ति विशेष- सूर्य भानु गुप्त, वीरेंद्र जैन Virendra Jain। शहरों की रूह- इण्डोनेशिया का रंगमंच / रामलीला, हिजाब वाली सीता, डॉ. अफ़रोज़ ताज Afroz Taj
संस्मरण- सुधियों के पन्नों से- माश्की काका, शशि पाधा Shashi Padha । स्मृति शेष- मास्टर ग़ज़लकार प्राण शर्मा को श्रद्धांजलि, उषा राजे सक्सेना Usha Raje Saxena । ग़ज़लें- विज्ञान व्रत Vigyan Vrat , सुभाष पाठक ‘ज़िया’ , राज़िक़ अंसारी Razik Ansari , ख़याल खन्ना। कविताएँ- @अनिल प्रभा कुमार AnilPrabha Kumar , डॉ. प्रदीप उपाध्याय @pradeep upadhyay , प्रगति गुप्ता Pragati Gupta , @मालिनी गौतम @malini gautam , प्रतिभा चौहान Pratibha Chauhan , डॉ. संगीता गांधी @sangita gandhi , नीलिमा शर्मा निविया @nilima sharma , परितोष कुमार ‘पीयूष’ @paritosh kumar piyush , गौरव भारती Gaurav Bharti , पूनम सिन्हा ‘श्रेयसी’ @poonam sinha । नवगीत- जगदीश पंकज @jagdish pankaj। समाचार सार- अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन Jyoti Jain , ‘मोगरी’ का लोकार्पण Murari Gupta , छोटे बच्चे गोल-मटोल का लोकार्पण, अरुण अर्णव खरे के संग्रह कालोकार्पण Arun Arnaw Khare , रामदरश मिश्र का सम्मान, डॉ. कमलकिशोर गोयनका प्रज्ञा सम्मान Kamal Kishore Goyanka , अभी तुम इश्क़ में हो का लोकार्पण , गोपालदास नीरज को सम्मानित किया, कथाकार अभिमन्यु अनत को श्रद्धांजलि, शैलेंद्र शरण के संग्रहों का लोकार्पण Shailendra Sharan , डॉ. लालित्य ललित Lalitya Lalit को सम्मान, डॉ. कर्नावट Jawahar Karnavat को राष्ट्रीय पुरस्कार, ध्रुपद कार्यशाला, चन्दन-माटी उपन्यास का विमोचन, पटना में लघुकथा विमर्श कार्यक्रम, साहित्य आयोजन पश्चिमी दिल्ली में, मोर्रिस्विल्ल में साहित्यिक गोष्ठी, गुफ़्तगू सम्मान समारोह, आख़िरी पन्ना 74 आख़िरी पन्ना। आवरण चित्र राजेंद्र शर्मा Babbal Guru डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी Sunny Goswami Shaharyar Amjed Khan , आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्क़रण भी समय पर आपके हाथों में होगा।
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विभोम स्वर टीम

शिवना साहित्यिकी का अप्रैल-जून 2018 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक, सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra , प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी Neeraj Goswamy , संपादक पंकज सुबीर Pankaj Subeerr , कार्यकारी संपादक, शहरयार Shaharyar , सह संपादक पारुल सिंह Parul Singh के संपादन में शिवना साहित्यिकी का अप्रैल-जून 2018 अंक अब ऑनलाइन उपलब्धl है। इस अंक में शामिल है- आवरण कविता - पारुल सिंह Parul Singh। संपादकीय / शहरयार। व्यंग्य चित्र / काजल कुमार Kajal Kumar। स्मरण - सुशील सिद्धार्थ Sushil Siddharth /अशोक मिश्र Ashok Mishraa । जो पिछले दिनों पढ़ा... हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज गौतम राजऋषि , गूदड़ बस्ती Pragya Rohini , अभी तुम इश्क़ में और हसीनाबाद Geeta Shree , सुधा ओम ढींगरा। विमर्श - फ़ेक एनकाउंटर / प्रेम जनमेजय, अपूर्व जोशी Apoorva Joshi । पेपर से पर्दे तक... कृष्णकांत पण्ड्या Krishna Kant Pandya । फिल्म समीक्षा के बहाने- निमकी मुखिया / वीरेन्द्र जैन Virendra Jain। पुस्तक-आलोचना- हंसा आएगी ज़रूर / डॉ. सीमा शर्मा । पुस्तक चर्चा - चम्बल में सत्संग / अशोक अंजुम Ashok Anjum । तेरी हँसी -कृष्ण विवर सी / पूनम सिन्हा ‘‘श्रेयसी’’ Punam Sinha । हैप्पीनेस ए न्यू मॉडल ऑफ ह्यूमन बिहेवियर / तरुण कुमार पिथोड़े Tarun Pithode Mukesh Dubey , टुकड़ा टुकड़ा इन्द्रधनुष / आशा शर्मा, निब के चीरे से / ओम नागर Om Nagar , पुरवाई/ कृष्णा अग्निहोत्री Krishna Agnihotri , तुम्हारे जाने के बाद / कृष्णकांत निलोसे Krishnakant Nilosey Dr Prakash DrPrakash Hindustanii । समीक्षा- चित्रा देसाई Chitra Desai / ज़िंदगी का क्या किया / धीरेन्द्र अस्थाना Dhirendra Asthana , जवाहर चौधरी Jawahar Choudhary / स्वप्नदर्शी / अश्विनी कुमार दुबे , सुषमा मुनीन्द्र @sushma munindra / तपते जेठ में गुलमोहर जैसा / सपना सिंह, घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ Ghanshyam Maithil Amrit / ढाक के तीन पात / मलय जैन Maloy Jain , राजेश्वरी @rajeshwari / अच्छा, तो फिर ठीक है/ कामेश्वर Kameshwar Pandey , रेणु / मन कितना वीतरागी / पंकज त्रिवेदी Pankaj Trivedi Pankaj Trivedi , डॉ. नितिन सेठी / 51 किताबें ग़ज़लों की / नीरज गोस्वामी Neeraj Goswamy , पारुल सिंह Parul Singh / बात फूलों की / सर्वजीत सर्व , गोविन्दप्रसाद बहुगुणा / हाईवे E 47/ अर्चना पैन्यूली Archana Painuly । यात्रा संस्मरण- पधारो म्हारे देस ...../ राजश्री मिश्रा Rajshree Mishra । रपट- भारत भवन/ प्रवीण पाण्डेय Praveen Pandey , नाटक / प्रज्ञा Pragya Rohini । आवरण चित्र राजेंद्र शर्मा Babbal Guru , डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी Sunny Goswami । आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा। ऑन लाइन पढ़ें-

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नई पुस्तकें



शिवना साहित्यिकी का जनवरी-मार्च 2018 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक, सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra , प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी Neeraj Goswamy , संपादक पंकज सुबीर Pankaj Subeerr कार्यकारी संपादक, शहरयार Shaharyar , सह संपादक पारुल सिंह Parul Singh के संपादन में शिवना साहित्यिकी का जनवरी-मार्च 2018 अंक अब ऑनलाइन उपलब्धl है। इस अंक में शामिल है- आवरण कविता, कहाँ गई चिड़िया...? / लालित्य ललित Lalitya Lalit , संपादकीय, शहरयार Shaharyar । व्यंग्य चित्र, काजल कुमार Kajal Kumar । आलोचना, नई सदी के हिंदी उपन्यास और किसान आत्महत्याएँ, डॉ. सचिन गपाट Sachin Gapat। संस्मरण आख्यान, सुशील सिद्धार्थ Sushil Siddharth Gyan Chaturvedi । विमर्श- गोदान के पहले, जीवन सिंह ठाकुर Jeevansingh Thakurr । संस्मरण- अविस्मरणीय कुँवर जी, सरिता प्रशान्त पाण्डेय । फिल्म समीक्षा के बहाने- मुज़फ्फरनगर, वीरेन्द्र जैन Virendra Jain । पेपर से पर्दे तक..., कृष्णकांत पण्ड्या Krishna Kant Pandya । पुस्तक-आलोचना- चौबीस किलो का भूत, अतुल वैभव Atul Vaibhav Singh Bharat Prasad । नई पुस्तक- हसीनाबाद / गीताश्री Geeta Shree , गूदड़ बस्ती / प्रज्ञा Pragya Rohini । समीक्षा- उर्मिला शिरीष Urmila Shirish , चौपड़े की चुड़ैलें, पंकज सुबीर, अशोक अंजुम Ashok Anjum Ashok Anjum , सच कुछ और था / सुधा ओम ढींगरा, मुकेश दुबे Mukesh Dubey , बंद मुट्ठी / डॉ. हंसा दीप @Dharm Jain , राम रतन अवस्थी Ram Ratan Awasthii , बातों वाली गली / वंदना अवस्थी दुबे, डॉ. ऋतु भनोट Bhanot Ritu , जोखिम भरा समय है / माधव कौशिक Madhav Kaushik , प्रतीक श्री अनुराग @pratik shri anurag / संतगिरी / मनोज मोक्षेंद्र Mokshendra Manoj । आवरण चित्र पल्लवी त्रिवेदी Pallavi Trivedi , डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी Sunny Goswami । आपकी प्रतिक्रियाओं का संपादक मंडल को इंतज़ार रहेगा। पत्रिका का प्रिंट संस्करण भी समय पर आपके हाथों में होगा। ऑन लाइन पढ़ें-
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शिवना साहित्यिकी का अक्टूबर-दिसम्बर 2017 अंक

मित्रों, संरक्षक एवं सलाहकार संपादक, सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra , प्रबंध संपादक नीरज गोस्वामी Neeraj Goswamy , संपादक पंकज सुबीर Pankaj Subeer कार्यकारी संपादक, शहरयार Shaharyar , सह संपादक पारुल सिंह Parul Singh के संपादन में शिवना साहित्यिकी का अक्टूबर-दिसम्बर 2017 अंक अब ऑनलाइन उपलब्धl है। इस अंक में शामिल है- आवरण कविता जीवन भर का उजाला / सुरजन परोही , संपादकीय / शहरयार, व्यंग्य चित्र / काजल कुमार Kajal Kumar , आलोचना आलोचना में संप्रेषण का प्रश्न, पंकज पराशर Pankaj Parashar , संस्मरण आख्यान होता है शबोरोज़ तमाशा मिरे आगे, सुशील सिद्धार्थ Sushil Siddharth , विमर्श स्वातंत्र्योत्तर आदिवासी काव्य में समाज और संस्कृति / रजनी मल्होत्रा Rajni Nayyar Malhotra , संस्मरण इन्डियन फ़िल्में और लड़कियाँ सबूहा ख़ान Zeba Alavi , फिल्म समीक्षा के बहाने लिपिस्टिक अन्डर माई बुरका, न्यूटन वीरेन्द्र जैन Virendra Jain , पुस्तक-आलोचना महेश दर्पण Mahesh Darpan / चुनी हुई कहानियाँ : सूर्यबाला Suryabala Lal / सूर्यबाला, नई पुस्तक कल्चर वल्चर / ममता कालिया Mamta Kalia , प्रकाश कांत Prakash Kant / अपने हिस्से का आकाश, खिड़की खुलने के बाद / @नीलेश रघुवंशी Neelesh Raghuwanshi , असंभव से संभव की ओर / तरुण पिथोड़े Tarun Pithode रंगमंच प्रज्ञा Pragya Rohini / प्रेम जनमेजय के दो व्यंग्य नाटक / डॉ. प्रेम जनमेजय, पुस्तक चर्चा फ़ारुक़ आफ़रीदी Farooq Afridy Jaipur / विलायती राम पांडेय / लालित्य ललित Lalitya Lalit , @महावीर रवांल्टा / पथ का चुनाव / कांता राय Kanta Roy , डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी Reshmi Panda Mukherjee / अस्थायी चार दीवारी / वाणी दवे @vani dave , समीक्षा डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी Gyan Chaturvedi / सच कुछ और था / सुधा ओम ढींगरा Sudha Om Dhingra , शैलेन्द्र अस्थाना Shailendra Asthana / विघटन / जयनंदन Jai Nandan , प्रदीप कान्त / सजदे में आकाश / कुमार विनोद @kumar vinod , शशि कुमार पांडेय @shashi kumar pandey / फ़ेक एनकाउंटर / डॉ. मुकेश कुमार Mukesh Kumar , सुरजीत सिंह @surjeet singh / बुरी औरत हूँ मैं / वंदना गुप्ता Vandana Gupta , सौरभ पाण्डेय Saurabh Pandey / थोड़ा लिखा समझना ज़्यादा / जय चक्रवर्ती Jai Chakrawarti , पारुल सिंह Parul Singh / चौपड़े की चुड़ैलें / पंकज सुबीर Pankaj Subeer , फ़िल्म-आलोचना पार्टीशन : 1947 - तथ्यात्मक भ्रांतियों के बीच मानवीय संवेदनशीलता प्रमोद मीणा Pramod Meena । आवरण चित्र राजेंद्र शर्मा बब्बल गुरु Babbal Guru डिज़ायनिंग सनी गोस्वामी Sunny Goswami ,
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शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. मुकेश कुमार Mukesh Kumar के संग्रह फ़ेक एनकाउंटर का प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में हुआ विमोचन

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23 सितंबर, नई दिल्ली। कोई भी सर्व सत्तावादी जिस चीज़ से सबसे ज़्यादा डरता है वह है व्यंग्य। वह व्यंग्य को बर्दाश्त नहीं कर पाता यहां तक कि कार्टून को बर्दाश्त नहीं कर पाता। ऐसे में व्यंग्य लिखना भारी जोखिम का काम है और वह मुकेश कुमार ने किया है। ये उनका दुस्साहस है कि उन्होंने फेक एनकाउंटर लिखा। ये विचार जाने-माने कथाकार एवं कवि उदयप्रकाश UDAY Prakash ने डॉ. मुकेश कुमार की किताब फेक एनकाउंटर के लोकार्पण के अवसर पर कही। लोकार्पण दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के सभागार में हुआ। कार्यक्रम में साहित्य एवं पत्रकारिता के अलावा अन्य क्षेत्रों के सौ से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे उदयप्रकाश ने कहा, “ मैंने इस किताब को पढ़ा है और मैं ये कह सकता हूँ कि ये एक ऐसी किताब है जिसे शुरू करने के बाद रखना मुश्किल हो जाता है। मुकेश कुमार ने कभी भी सामाजिक सरोकारों को छोड़ा नहीं और वह प्रतिबद्धता फ़ेक एनकाउंटर में भी देखी जा सकती है।“
उदयप्रकाश ने किताब की खूबियों पर रोशनी डालते हुए कहा कि सभी फ़ेक एनकाउंटर बहुत चित्रात्मक हैं, विजुअल हैं और इसका नाट्य रूपांतर करके कोई टेलीविज़न शो किया जाए तो वह चैनलों पर चलने वाले कई व्यंग्यात्मक कार्यक्रमों से बेहतर होगा, वह अद्भुत होगा और उसे बनाया जाना चाहिए।
इससे पहले कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ओम थानवी Om Thanvi ने मौजूदा समय की चुनौतियों, बढ़ती असहिष्णुता सत्ताधारियों के चरित्र का ज़िक्र करते हुए कहा कि मुकेश जी के सौम्य व्यक्तित्व की झलक इस किताब की भाषा और उनके कहने के अंदाज़ में भी है। शोर-शराबे के इस दौर में मुकेश ऐसा कर रहे हैं ये अच्छी बात है। उन्होंने कहा कि फ़ेक एनकांउटर में काल्पनिक इंटरव्यू के ज़रिए उन्होंने मौजूदा दौर का खाक़ा खींचा है और कहना होगा कि उनकी रेंज बहुत बड़ी है। उन्होंने ओबामा से लेकर मोदी तक सबके साथ एनकाउंटर किया है और साथ ही साथ पत्रकारों की स्थिति को भी उजागर किया है। थानवी ने कहा कि ये बहुत ख़तरनाक़ दौर है और इस किताब के बहाने उस दौर की भी चर्चा की जानी चाहिए, उसे भी जाँचा-परखा जाना चाहिए।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता की हैसियत से हिस्सा ले रहे वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक प्रियदर्शन ने कहा कि वे फ़ेक एनकाउंटर लगातार पढ़ते रहे हैं और उसे एक किताब के रूप में पढ़ना उनके लिए एक नया अनुभव था। उन्होंने कहा कि किताब में संकलित फर्ज़ी एनकाउंटर झूठ को बेनकाब करते हैं। मुकेश जी ने व्यंग्य के शिल्प को बहुत करीने से साधा है और वह पारंपरिक शिल्प नहीं है। हम लोग व्यंग्य की जिस परंपरा की बात करते हैं ये उनसे हटकर हैं। वे पत्रकारिता के भीतर इंटरव्यू के मार्फ़त उन स्थितियों को ऐसे रख देते हैं जो अपने ढंग से विडंबनामूलक हैं और हम उन्हें व्यंग्य की तरह पढ़ने लगते हैं। मुझे अंदेशा था कि कहीं पूरी की पूरी किताब उसी वैचारिक लाइन पर न हो जिसके लिए लेखकों को बदनाम कर दिया गया है। मैंने पाया कि ये शिथिलता बिल्कुल भी नहीं है और इसमें सारे पक्ष आ गए हैं। ये शिकायत कोई नहीं कर सकता कि ये किताब किसी एक विचारधारा की ओर झुकी हुई है।
प्रियदर्शन ने किताब की विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि मुकेशजी शिल्प के स्तर पर भी प्रयोग कर रहे हैं.। उन्होंने कार्टून और कैरीकेचर की विधा का भी इसमें इस्तेमाल किया है। वे अपने पर भी चुटकी लेने से परहेज़ नहीं करते। उन्होंने कहा कि किताब पर तात्कालिकता बहुत हावी है और इसलिए मैं पाता हूं कि दस-पंद्रह साल बाद कोई पढ़ेगा तो उसे आज के चरित्रों के बारे में कितना पता होगा। मुकेश जी को तात्कालिकता से आगे जाने की ज़रूरत है। इस सबके बावजूद इसे लगातार पढ़ने की होती है और इसे कहीं से भी पढ़ा जा सकता है।
किताब के लेखक डॉ. मुकेश कुमार ने कहा कि हम एक फ़ेक समय में रह रहे हैं। इस समय मे सब कुछ फ़ेक है। मीडिया तो फ़ेक है ही, फ़ेक राष्ट्रवाद है, फ़ेक दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक प्रेम है। उन्होंने कहा कि नेता राजनीति फ़ेक है और इस वजह से लोकतंत्र भी फ़ेक लगने लगा है। इस फ़ेक को काटने के लिए उन्होंने इन फर्जी एनकाउंटर का सहारा लिया और उन्हें खुशी है कि इन्हें देश भर में खूब पढ़ा और सराहा गया।
सुपरिचित कवयित्री एवं शिवना प्रकाशन की निदेशक पारुल सिंह Parul Singh ने किताब का परिचय देते हुए कहा कि फेक एनकाउंटर अनूठा व्यंग्य संग्रह है और व्यंग्य पत्रकारिता की पहली पुस्तक है। ये व्यंग्य संग्रह पहले बनाए गए दायरों को तोड़कर आगे निकल जाता है। मुकेश कुमार ने बहुत सारे नए प्रयोग किए हैं और इसलिए भी साहित्य एवं पत्रकारिता जगत में इसकी चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने मुकेश कुमार इसके लिए आभार व्यक्त किया कि उन्होंने ये व्यंग्य संग्रह प्रकाशन के लिए शिवना प्रकाशन को दिया।
लोकार्पण समारोह की एक बड़ी विशेषता जानी मानी टीवी ऐंकर आरफ़ा ख़ानम शेरवानी Arfa Khanum का संचालन रहा। अपने टीवी कार्यक्रमों की ही तरहअपने सधे हुए संचालन के ज़रिए उन्होंने किताब को मौजूदा संदर्भों, समस्याओं और विवादों से जोड़ते हुए बातचीत को सार्थक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने किताब के कुछ अंश पढ़े और अपनी तीखी एवं चुटीली टिप्पणियों से मीडिया के चरित्र को उजागर किया भी किया।
आरफ़ा ने मुकेश कुमार की ऐंकरिंग की चर्चा करते हुए कहा कि मैं उन्हें बतौर ऐंकर अच्छे से जानती है वह आतंकित कर देने वाली ऐंकरिंग के विपरीत सौम्यता लिए हुए है। यही बात उनकी इस किताब में दिखती है। उन्होंने किताब के कुछ अंशों का पाठ भी किया।