दीपक चौरसिया की अनुभूतियां की कविताएँ मनन माँग रही हैं - डॉ. मोहम्‍मद आज़म

 

anubhutiyan

azam ji 180936
     -डॉ. मोहम्मद आज़म                 दीपक चौरसिया मशाल

इससे पहले कि मैं दीपक चौरसिया मशाल की शाइरी पर अपना खयाल पेश करूँ मैं आज़ाद नम या छंद मुक्त कविता के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ । गालिब ने कहा था- बकर्दे-शौक नहीं जर्फे-तंगनाए ग़ज़ल, कुछ और चाहिये वुसअत मेरे बयाँ के लिये। (बकर्दे-शौक: इच्छानुसार, ज़र्फे-तंगनाए ग़ज़ल: ग़ज़ल का तंग ढांचा, वुसअत: विस्तार ।)
गालिब ही क्यूँ हर शाइर को कभी न कभी यह एहसास होता है वह ग़ज़ल की  पाबंदियों में फंसकर अपनी बात, खुल कर नहीं कह पाता । सिर्फ ग़ज़ल ही क्यों पाबंद नमों में भी कैद महसूस करता है कि वह जो कहना चाहता है वह दिल भर, जी भर कर कह नहीं पा रहा है । शायद इसी उलझन की वजह से मुक्त कविताओं या आज़ाद नमों का सिलसिला शुरू हुआ होगा । इसमें आज़ादी यह रहती है कि कवि अपनी भावनाओं को शब्दों के बेहिसाब गिलाफ पहना कर कांगा पर सजा देता है ताकि दिल का गुबार पूरी तरह से निकल सके ।
दूसरी वजह मुझे यह महसूस होती है कि अकसर कविशाइर ग़ज़लकारी की बारीकियों से भिज्ञ ही नहीं होते, उन्हें आज़ाद नग्‍मों के रूप में भाग निगकलने का रास्ता (यानी राहे फरार) मिल जाता है । अर्थात अपनी कम फहमी को ढाँपने का एक जरिया ।
ऊपरी दोनों दलीलों के ज़रिये मैं कह सकता हूँ कि मुक्त कविताएँ ज़रूरी भी हैं और मजबूरी भी । बहुत से शाइरों ने बेपनाह खूबसूरत और मुकम्मल, दिल पर असर करने वाली, जेहन को झकझोर देने वाली आज़ाद नमें लिखी हैं । जिन्हें पढने के बाद यकीन हो जाता है कि वाकयी यह बातें पाबंद नग्‍मों या ग़ज़लों के माध्यम से कही नहीं जा सकती थीं । फिर गालिब की शिकायत जाया लगती है । मगर क्या कहें कि अक्सर (ज्‍यादातर) ऐसी छंद मुक्त कविताएँ पढने को मिलती हैं जो लिहाज से मुक्त होती हैं.. फन से मुक्त, हुनर से मुक्त, खयालों से मुक्त, असर से मुक्त, तब लगता है कि शाइर वांकयी फने शायरी से राहे फरार इख्तियार कर गया है, यानी भगोड़ा शाइर है । वैचारिक स्तर पर न उसके पास कुछ है और न ही साहित्यिक चेतना ही उसके पास है ।
किसी भी रचनाकार का उद्देश्य सिर्फ पढ़ने वालों पर अपने विचारों का असर छोड़ना ही होता है । अगर उसमें वह कामयाब नहीं है तो सारी मेहनत बेकार है। फिर आज़ाद नमों में सबसे बड़ी खराबी ये होती है उसे पढ़ते वंक्त किसी 'रिद्म' का ना तो आभास होता है औन न ही कुछ ज़ेहन में महफूज़ रहता है, जो कि शायरी की बुनियादी आवश्यकताएँ हैं । वरना तो बेहतर है गद्य लिखा जाए (गद्य भी कुछ लोग इस प्रकार लिखते हैं कि उसमें शायरी का लुत्फ आ जाता है, खैर ।) । इसीलिये आज़ाद नज्‍म का मैं जबर्दस्त प्रशंसक कभी नहीं रहा । नसरी नज्‍म अर्थात गद्यात्मक पद्य कभी कभी तो उल्टी हो जाती है, यानी पद्यात्मक गद्य बन जाती है, अर्थात पद्य ही नहीं रहती  ।
छंद मुक्त कविताओं को इसलिये इस प्रकार लिखा जाना चाहिये कि कि पढ़ने वाला, पढ़ते रहने का पाबंद हो जाए । शुरू करे तो खत्म तक पहुँचकर ही दम ले । वरना होता यह है कि मुक्त कविताओं से पाठक ही मुक्त हो जाता है, यानी कुछ लाइनें पढ़कर भाग खड़ा होता है । इसीलिये ऐसी कविताओं में शब्दों का चयन लाजवाब होना चाहिये और उनकी तरतीब इतनी सुंदर होनी चाहिये कि पाठक एक मोहपाश में बंध जाए और अंत में उसे आभास होना चाहिये कि उसने एक सार्थक रचना पढ़ी है ।
आइये अब बात करते हैं दीपक चौरसिया 'मशाल' की 'अनुभूतियाँ' की । जैसा कि मैं पहले ही जिक्र कर चुका हूँ छंदमुक्त कविताओं का मैं जबरदस्त फैन नहीं रहा इसलिये अक्सर सरसरी नारों से पढ़ता हूँ । 'अनुभूतियाँ' पर भी मैंने इधर उधर से एकाध कविता पर उचटती नार डाली तो मुझे फौरन ही एहसास हो गया कि ये कविताएँ मनन माँग रही हैं, ये गंभीरता चाह रही हैं । इन्हें ऑंख खोलकर नहीं बल्कि दिल व दिमांग खोलकर पढ़ने की आवश्यकता है  । फिर यह हुआ कि यहाँ वहाँ से पढ़ने के बजाए मेरा मन हुआ कि प्रारंभ से अंत तक पुस्तक पढ़ूँ । पहली कविता ने मेरा मन मोह लिया । माँ एक शब्द नहीं माँ एक कायनात है । आजकल तो कवियों और  शाइरों में एक होड़ सी लग गई है और सब इस नाम को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं । क्योंकि माँ हर इन्सान के लिये आदरणीय शब्द है और वह अपनी हस्ती के लिये उसका ही क़र्जदार होता है । मशाल ने भी 'आज भी' तथा 'मुझे तेरी ज़रूरत है' में माँ की महत्ता दर्शायी है ।
दुनिया की हर ऊँचाई  तेरे कदम चूमती है ।
मुहब्बत एक ऐसी अनुभूति है जिससे कोई भी मानव हृदय उद्वेलित हुए बिना नहीं रहा सकता । मशाल की कविताओं में भी मुहब्बत मौजूद है मगर अधिकतर निराशाजनक पहलू के संग । 'कैसे हो' कविता में उनकी निराशा उनके और उनकी प्रेयसी में मौजूद विसंगतियों के कारण है ।
'महकती हुई भीनी खुश्बू सी तुम  और बिखरी हुई ख्वाहिश सा मैं  तुम अंबर में उड़ना चाहते  मैं ज़मीं से जुड़ना चाहता  मुहब्बत मुमकिन कैसे हो ।'
कवि मन अत्यंत भावुक होता है । कवि के निकट सबसे निंदनीय कृत्य इंसानों द्वारा इंसानों पर अत्याचार होता है । वह समाज को संदेश देता है, भाईचारे को सर्वोपरि बताता है, उसका ध्येय सिर्फ  एक सुंदर एवं स्वस्थ समाज की संरचना, एक बेहतर विश्व की कल्पना होता है । यही कबीर, रहीम, मीर, ंगालिब और तमाम प्रसिध्द एवं अप्रसिध्द शायर व कवि कह गये हैं । मशाल ने भी यह प्रयास किया है । 'नये सिरे से' में कहते हैं-
देव बसते थे कभी यहाँ पर  अब शैतानों की बस्ती है जीवन का कोई मूल्य नहीं और मौत मुंफ्त में बँटती है  नये सिरे से सोचें अब हम ।
जीवन क्या है यह क्यूँ है ऐसे सवाल मनुष्य के मन में आते रहते हैं । जन्म लेना, उम्र गुजारना, फिर मर जाना बाद में खप जाना, यह क्या सिलसिला है ? अनंत काल से चलता आ रहा है । इंसान मौलिक प्रश्‍न से उलझा रहा है ..जीवन क्या है । मशाल ने बड़ी कामयाबी से राज़ खोल दिया है, बड़ी आसानी से 'शीर्षक' में कहते हैं क्योंकि जीवन कविता नहीं एक पहेली है और पहेली का कोई शीर्षक नहीं होता ।
कविता लिखना इतना आसान नहीं होता, कई बार तो कवि को उसी अवस्था से ग़जारना पड़ता है जिनसे बच्चे को जन्म देते समय माँ को ग़ुजारना होता है । प्रसव पीड़ा से इसकी समानता दें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । 'थकावट' में यह पीड़ा महसूस की जा सकती है ।
विदेश में रहकर भी भारत की मौजूदा राजनैतिक वातावरण से विचलित है, इस बात से खिन्न है कि बजाए देश को प्रगति के पथ पर ले जाने के प्रयास करने के, लोग मंदिर मस्जिद में उलझकर देश का सत्यानाश कर रहे हैं । वह इसे राजनैतिक पतन मान रहे हैं ।
कई संबंध मात्र समझौतों के बलबूतों पर चलते हैं । दो व्यक्ति सम स्वभाव के हो नहीं सकते इसीलिये मेरे विचार से संबंधों में विश्वास से कहीं यादा समझौतों की आवश्यकता है । सामंजस्य तभी बनेगा, संबंध तभी नहीं टूटेगा । कुछ संबंध इतने उलझे होते हैं कि उन्हें चाहकर भी तोड़ नहीं सकते, दूसरे शब्दों में उन्हें झेलना ही पड़ता है । मशाल ने 'समझौता' में यही बात निहायत बेबाकी से कह दी है ।
जब किस्मत में उनके साथ रहना लिखा है तो क्यों न  उनसे समझौता कर लूँ ।
दरअस्ल 'अनुभूतियाँ' में उन्होंने अपनी तमाम अनुभूतियों को अक्षरों एवं शब्दों के माध्यम से पेश कर दिया है । हर विषय के रंगों से शाइरी के कैनवस को रंगीन कर दिया है । इनके यहाँ अगर गम, दर्द, विरक्ति, निराशा मजबूरी, समझौतों के धुंधले और काले शेड दिखते हैं तो वहीं प्रसन्नता, आशा की बेहद चमकदार किरणें भी नार आती हैं । इनमें लिखने की ललक प्रतीत होती है । इनमें कसक, तड़प, सच्चाई, बंगावत, आग, जबात, इश्क, तहज़ीब, देशभक्ति, तंज व व्यंग्य, रिश्तों की पाकीज़गी का ध्यान आदि आदि तमाम वह गुण हैं जो एक व्यक्ति को कवि शाइर का दरजा प्रदान करते हैं । मेरी बस एक सलाह है कि निरंतर फन के उस्तादों को पढ़ते रहें और निरंतर कुछ नया गढ़ते रहें । उनमें योग्यता है बाकी रियाज़ जारी रखें तो मुझे विश्वास है उन्हें एक विशिष्ट स्थान प्राप्त हो जाएगा ।
टी.एस. इलियट ने कहा था 'रचनाकार को निरंतर प्रयासरत रहना चाहिये न जाने कब उसके दिल दिमाग की कोई खिड़की खुल जाए और अपने को व्यक्त करने का कोई रास्ता मिल जाए ।'
इस  आशा के साथ कि भविष्य में उनकी रचनाएँ और प्रकाशित होती रहेंगीं और वह एक स्थापित कवि बन जाएँगे (यह कोई दुआ नहीं है बल्कि उनकी संभावनाओं को समझकर किया गया उद्गार है ) अनुभूतियाँ के लिये उन्हें मुबारकबाद प्रेषित करता हूँ । 

7 comments:

गौतम राजरिशी said...

मुक्त कविताओं पर आज़म साब के विचार से पूरी तरह सहमत....ऐसा लगा कि कितने ही मेरे जैसे आम कविता-पाठकों के अहसास को आज़म साब ने शब्द दे दिया।

एक महीना पहले ही दिल्ली पुस्तक-मेला में हिंदी-उग्म के स्टाल से दीपक मशाल जी की किताब खरीद कर लाया हूँ...पूरी नहीं पढ़ी है अभी। कुछ कविताओं से मिला अपनी बिहार की ट्रेन-यात्रा में। कुछ-कुछ तो उनको पहले ही पढ़ चुका था उनके ब्लौग पर। आज़म साब की समीक्षा न्याय करती है संग्रह के साथ।

शिवना प्रकाशन जिस तरह से दिल्ली की शिल्पायन की तरह नये उभरते कवियों को सामने ला रही है, वो प्रशंसनीय है।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छा लगा।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 13.03.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

दीपक 'मशाल' said...

Azam sir ka bahut bahut shukriya.. jo unhone ek nishpaksh aur spasht sameeksha prastut ki..

दीपक 'मशाल' said...

Ye gurudev Pankaj Subeer ji ka athak prayas, sabhi badon ka aashervaad aur sathiyon ki duaon ka hi asar hai jo bina kisi vishesh samasya ke pahla kavya-sangrah prakashit ho saka..

सुलभ § सतरंगी said...

पढ़कर ख़ुशी हुई.

"अर्श" said...

मन के उन्मुक्त ख़याल जो सात्विक हैं बंधनों से कई बारी परे होती हैं... वो बन्धनों में बांध कर नहीं कही जा सकती ... और जिस तरह से आज़म साहब ने ग़ालिब की बातों से तर्क को सिद्ध किया है वो अपने आप में सराहनिया है... भाई दीपक मशाल के बारे में बहुत सुना है कुछ उनके और कुछ अपने बेहद नजदीक लोगों के जुबानी ...उनके ब्लॉग पर भी कई बार गया हूँ उनको पढने के खातिर... भाव को बेहद ही मजबूती से रखने में सक्षम है ये उम्र नयी है तो जाहिर है तौर और कहाँ में भी नयापन है ... सक्थिवों से परे हैं और स्वछन्द में बेहद खुबसूरत बात रखते हैं.. हालाकि इनकी पुष्तक को पढ़ने के अभी तक मौक़ा नहीं मिला है ,... मगर जरुर पढूंगा .... बधाई मशाल जी को ...


अर्श