सेना की नौकरी करते हुए भी ग़ज़ल की नाजुक विधा को साधते हैं मेजर संजय चतुर्वेदी (पीपुलस समाचार पत्र से साभार)


prakashan for corel copychand pe4sanjay chaturvedi

दिनाँक आठ मई को शिवना प्रकाशन तथा उर्दू अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में स्थानीय कुइया गार्डन में होने वाले अखिल भारतीय मुशायरे में जिन पुस्तकों का विमोचन होना है उनमें एक पुस्तक भारतीय सेना में मेजर के रूप में पदस्थ ग़ज़लकार संजय चतुर्वेदी की है । पहली बार में सुनने में बड़ा अजीब लगता है कि सेना की शुष्क नौकरी में रह कर ग़ज़ल जैसी नाजुक और नफासत भरी विधा को साधना, और वो भी सफलता के साथ । लेकिन सच यही है कि मेजर संजय न केवल ग़ज़लकार हैं बल्कि अच्छे और स्थापित ग़ज़लकार हैं ।
2001 में प्रशिक्षण के लिये संजय चतुर्वेदी का सेना में चयन हुआ और 2002 में रजत पदक के साथ उनको लैफ्टिनैंट के पद नियुक्ति मिली । आपरेशन पराक्रम के दौरान देश की पश्चिमी सीमा पर उनको सक्रिय तैनाती मिली । साथ ही सर्वश्रेष्ठ अधिकारी का अवार्ड भी प्राप्त हुआ । उनकी विशिष्ट उपलब्धियों के चलते भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में उनको अनुदेशक के पद पर प्रशिक्षण देने हेतु नियुक्त किया गया । वर्तमान में वे राजस्थान में तैनात हैं । यदि मेजर संजय का परिचय इतना ही होता तो कोई नई बात नहीं थी क्योंकि हर सैन्य अधिकारी का परिचय लगभग ऐसा ही होता है । लेकिन जो बात उनको विशिष्ट बनाती है वो है उनका साहित्य प्रेम । शिवना प्रकाशन सीहोर से उनका एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित होकर आ रहा है  जिसका नाम है चाँद पर चाँदनी नहीं होती । संग्रह की भूमिका में देश के शीर्ष शायर पद्मश्री श्री बेकल उत्साही लिखते हैं कि संजय ने दुष्यंत की डगर पर चलते हुए नये आयामों को निखार देने का कार्य किया है । तथा हिन्दी ग़ज़लके सफर को नये तजरुबे तथा नयी पहचान देने की कोशिश की है । वहीं मप्र उर्दू अकादमी की सचिव तथा सुप्रसिध्द शायरा नुसरत मेहदी लिखती हैं कि मेजर संजय की दृष्टि पैनी है तथा भाषा सहज एवं सरल है । उनमें आधुनिक विचारधारा और धरती के धरातल पर कदम जमाकर ग़ज़ल कहने का साहस मौजूद है । दिग्गज साहित्यकारों द्वारा कही गई ये बातें इस बात सिध्द करती हैं कि सेना के शुष्क माहौल में रहकर भी संजय चतुर्वेदी ने अपने अंदर की नमी को सूखने नहीं दिया है । वे स्वयं भी कहते हैं कि सेना के कठोर नियमों के प्रभाव तथा अति व्यस्त दिनचर्या के बीच रचनाधर्मिता को जारी रखना इतना आसान नहीं था, लेकिन उसी कठिन माहौल ने अपनी क्षमता से बढ़कर प्रदर्शन करना भी सिखाया और ग़ज़लगोई जिंदा रही ।  दिल जला, फसलें जलीं, छप्पर जला, सिर्फ चूल्हा छोड़ सारा घर जला, या फिर सर्द मौसम, गर्मियाँ सावन सड़क पर देखिये, मौत बच्चे शादियाँ बचपन सड़क पर देखिये, या फिर उसने काँटा मुझे चुभोया है, दर्द होने पे खुद भी रोया है जैसे संवेदना से भरे हुए शेर मेजर संजय को विशिष्ट बना देते हैं । इसी सब के चलते उनको उत्तराखण्ड का दिगंतराज साहित्य सम्मान प्रदान किया गया । मेजर संजय चतुर्वेदी दिनाँक आठ मई को स्थानीय कुइया गार्डन में होने वाले अखिल भारतीय मुशायरे में शिरकत भी करेंगें और अपनी ग़ज़लों का पाठ भी करेंगे, सीहोर के श्रोताओं के लिये ये एक नया ही अनुभव होगा किसी सैन्य अधिकारी को शायर के रूप में सुनने का । सुनना नये दौर की ग़ज़लें जिन्हें बेकल उत्साही जी ने कहा है दुष्यंत कर परंपरा की ग़ज़लें- लोग पढ़ते हैं कसीदे शान में जाने ऐसा क्या है उस मुस्कान में, मैंने खुद को आदमी उस दिन कहा, राम जब मुझको दिखे कुरआन में ।

साभार पीपुल्‍स समाचार पत्र से

4 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

इतने बड़े और ज़िम्मेदारी भरे ओहदे पर रहते हुए भी ग़ज़ल लेखन और मुशायरों के लिए समय निकलना और बड़ी ही कुशलता से उसका निर्वाह करना निश्चित रूप से संजय जी के महानता और प्रतिभा का परिचय देता है..

संजय जी को बधाई!!!

दीपक 'मशाल' said...

Badhai Mejor Sanjay ji ko..
ye league badhtee hi jaayegi.. Gautam ji hue, Sanjay ji hue.. abhi aur bhi aayenge aur tab hum kah sakenge ki dekhiye ek shayar sainik bhi hai.

सुलभ § सतरंगी said...

मेजर संजय चतुर्वेदी जी से मिलकर बहुत अच्छा लगा

नरेन्द्र व्यास said...

बहत अच्‍छा लगा मेजर संजय जी के बारे में जानकर । इतनी कठोर कही जाने वाली जिम्‍मेदारीयुक्‍त सेवा में होते हुए भी उनके सहज और नर्म दिल का परिचायक है आपका ये कृतित्व| आपके इस बहुमुखी व्‍यक्तित्‍व को सलाम ।।