संगीता स्‍वरूप गीत जी की कविताएँ अपने समय का सही प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करती हैं - रमेश हठीला ।

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उजला आसमां, काव्‍य संग्रह,  लेखिका संगीता स्‍वरूप गीत

संगीता जी की कविताओं के माध्यम से उनकी काव्य यात्रा को जानने का अवसर मिला । संगीता जी की ये कविताएँ उस नये युग की कविताएँ हैं जहाँ पर कविताओं को प्रकाशन के लिये किसी सम्पादक की कृपादृष्टि पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है । ये इंटरनेट का युग है जहाँ सब कुछ लेखक के हाथ में आ गया है । हालाँकि इस सब के दुष्परिणाम भी सामने आये हैं तथा कविता के नाम पर इंटरनेट पर हर कोई कुछ भी लिख कर परोस रहा है । और इसी कारण इस लेखन को गंभीर साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा जा रहा है । लेकिन ऐसे समय में जब इंटरनेट की कविताओं को बहुत महत्व नहीं दिया जा रहा है, उस समय में संगीता जी की कविताएँ साहित्य के प्रतिमानों पर खरी उतरती हुई मानो इस बात का मुखर विरोध कर रही हैं कि इंटरनेट पर गंभीर साहित्य नहीं लिखा जा रहा है । ये सारी कविताएँ किसी भी साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित होने वाली कविताओं से किसी भी रूप में कम नहीं हैं । इसके अलावा जो बात संगीता जी की कविताओं में प्रमुख रूप से दिखाई देती है वो है सरोकारों के प्रति सजगता । वे साहित्य के सरोकारों को बिल्कुल भी भूली नहीं हैं, ये बात उनकी कविताओं में पता चलता है । जैसे भ्रूण हत्या पर संगीता जी की कविता की ये पंक्तियाँ मन को एकबारगी झकझोर जाती हैं-
इस बार भी परीक्षण में  कन्या-भ्रूण ही आ गया है  इसीलिए बाबा ने मेरी मौत पर  हस्ताक्षर कर दिया है।
एक और कविता इसी प्रकार की है जो गहरे प्रश् छोड़ती हुई एक सन्नाटे को भेदती हुई समाप्त होती है । पूरी कविता मानो उस पीड़ा के राग पर रची गई है जो पीड़ा आज पृथ्वी की उस आधी आबादी की पीड़ा है जिसे नारी कहते हैं । जब ये कविता समाप्त होती है तो आधी आबादी के लिये शोक गीत की गूँज मन में छोड़ जाती है-
एक नवजात कन्या शिशु  जो कचरे के डिब्बे में  निर्वस्त्र सर्दी से ठिठुर दम तोड़ चुकी थी ।
संगीता जी एक और कविता बहुत गहरे अध्ययन की माँग करती है और ये कविता है गांधारी  इस कविता में कवयित्री अपने सर्वश्रेष्ठ को शब्दों में फूँकने में सफल रहीं हैं । पूरी कविता गांधारी को कटघरे में खड़ा करने  का एक ऐसा प्रयास है जो कि पूरी तरह से सफल रहा है । कवयित्री ने गांधारी के माध्यम से जो प्रश् उठाये हैं वे आज भी सामयिक हैं । गांधारी के चरित्र को आधार बना कर संगीता जी ने कई बहुत अच्छे प्रयोग कविता में किये हैं । और ये कविता मानो एक दस्तावेज की तरह आरोप पत्र दाखिल करती हुई गुज़रती है-
जब लड़खड़ाते धृतराष्ट्र तो  तुम उनका संबल बनतीं  पर तुमने तो हो कर विमुख अपने कर्तव्यों को त्याग दिया ।
संगीता जी की कविताओं में नारी के स्वाभीमान के प्रति एक प्रकार की अतिरिक्त चेतना भरी हुई साफ दिखाई देती है । ये कविताएँ नारी का अधिकार किसी से माँग नहीं रही हैं बल्कि नारी को ही जगा कर कह रहीं हैं-
और फिर एक ऐसे समाज की  रचना होगी  जिसमें नर और नारी की अलग-अलग नहीं  बल्कि सम्मिलित संरचना  निखर कर आएगी ।
संगीता जी की कविताओं में कुछ ऐसा विशिष्ट है जो उनकी कविताओं को आम कविताओं से अलग करता है । ये कविताएँ अपने समय का सही प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करती हैं । उनके  काव्य संग्रह का शीर्षक  उजला आसमाँ  वास्तव में स्त्री के भविष्य  की ओर इंगित करता है । और ये कविताएँ उस आकाश को पाने की कोशिश में समूची नारी जाति की ओर से एक कदम की तरह है । ये कदम सफल हो, मेरी शुभकामनाएँ ।
ramesh hathila ji1                      

-रमेश हठीला

4 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

जी हाँ ...संगीताजी के ब्लॉग पर नियमित रूप से जाना होता है...उन्हें पढ़ा है..... सुंदर पोस्ट

वन्दना said...

संगीता जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पंकज जी ,

यहाँ चर्चा करने के लिए आभार ..

Devi Nangrani said...

SanGeeta ji
aapko bahut bahut badhayi